सुरती खा के फुर्ती आये

सुरती खा के फुर्ती आये, जोश भरे दारु,

कैसे खुद को सुधारुं.

मन मेरा तभी हो चैतन्य, जब दम सुल्फे के मारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

प्राण मेरे गुटके में अटके, चूना लगे चारू,

कैसे खुद को सुधारुं.

आठ पेग पी ऐसे चलूँ, चले जैसे कंगारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

कभी कलाकार न बना, रहा सदा आडू,

कैसे खुद को सुधारुं.

 नशे को बेचे बोरिया बिस्तर, बिक गया झाडू,

कैसे खुद को सुधारुं.

इस खातिर घर गिरवी रखा, कैसे कर्ज उतारूँ,

कैसे खुद को सुधारुं.

गल गए किडनी लीवर, अंत अपना विचारू,

कैसे खुद को सुधारुं.

लगा घुन्न, चेतना सुन्न, सदा शून्य में निहारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

 नशे ने नहीं है सुख, न शेखी बघारुं,

कैसे खुद को सुधारुं.

मुझसे सबक ले दुनिया, न पिए कभी दारु,

कैसे खुद को सुधारुं.

Advertisements
Published in: on मार्च 31, 2010 at 2:30 अपराह्न  Comments (1)  

ये कविता मेरी नहीं

ये मानने में देरी नहीं है, ये कविता मेरी नहीं है.

नहीं मालूम ये किसने लिखी, मुझे सामने पड़ी दिखी.

पहले मन में हुआ संकोच, फिर उठा लिया कुछ सोच.

नहीं काबू में रही जिज्ञासा, खोल इसे पढ़ा थोडा सा __

“नारी तुम केवल अद्धा हो, नशा देती हो पल में,

कहीं मिलती हो थैली में, कहीं मिलती हो बोतल में.”

इतना उनको हुआ अवसाद, रो पड़े जयशंकर प्रसाद.

किसने बनाई इनती भोंडी, उनके काव्य की पैरोडी.

लगा झटका इतना तगड़ा, इस से आगे नहीं पढ़ा.

तत्काल निर्णय एक लिया, उसे वहीं फाड़ के फेंक दिया.

पता नहीं क्या लिखा था शेष, जो पढ़ा, आपको किया है पेश.

Published in: on मार्च 28, 2010 at 2:20 अपराह्न  Comments (1)  

हम भारत के नागरिक

कुत्ते सी जिंदगी जी कुत्ते की मौत मरेंगे,

हम भारत के नागरिक, और क्या करेंगे.

घिनौने नेता चुनते, फिर अपना ही सर धुनते,

बीज बबूल बो के, सपने आम के बुनते,

जो हैं हमारे सेवक, उनसे ही डरेंगे,

कुत्ते सी …

बॉस की गाली खाते, घर में बासी थाली खाते,

बदरंग जिंदगी में पुलाव ख्याली पकाते,

अपमान घर बाहर हर एक से सहेंगे,

कुत्ते सी …

डर डर के चले रोड पे, ठिठके हर मोड़ पे,

दुर्घटना के शिकार को, भागे मरता छोड़ के,

 किसी जरूरत मंद की कभी मदद न करेंगे,

कुत्ते सी …

मेरी आस्था बिकाऊ, मेरी निष्ठां एक विष्ठा है,

मैं थाली का हूँ बैगन, ऐसी मेरी प्रतिष्ठा है,

जिस ओर बहे धारा उधर ही बहेंगे,

कुत्ते सी …

कहलाऊं प्रगतिवादी पर हूँ मैं अवसरवादी,

मिला जहां मौका वहीं सिफारिश चिपका दी,

उपदेश दूसरों को सच्चाई का ही देंगे,

कुत्ते सी …

मैं वहीं पर झुक जाऊं जहां पर पड़े जूत,

मेरी कमर है कमजोर, मेरे घुटने मजबूत,

मुड़ के दोहरे होंगे, नहीं मगर टूटेंगे,

कुत्ते सी …

Published in: on मार्च 24, 2010 at 1:20 अपराह्न  Comments (1)  

देश की दुश्मन जनता

ओ देश की दुश्मन जनता,

तेरी बनी रहे निर्धनता.

निर्धन के लाभ हज़ार,

न पड़े कभी बीमार,

हुआ रोग कभी तो परमिट, सीधे मौत का बनता.

क्यों तुझे समझ नहीं पड़ता,

कोई बिन चीनी नहीं मरता,

चीनी खा हो डाइबिटीज, खर्च इंसुलिन का बढ़ता. 

मत होना तू गुमराह, 

क्यों है तुझे दाल की चाह,

प्रोटीन के गाउट होता, हो टखने में सूजनता. 

तू जीवन योगी का जी, 

हवा खा और पानी पी,

मैं नेता इसी तरह ला सकता देश में समता.

Published in: on मार्च 17, 2010 at 4:12 अपराह्न  टिप्पणी करे  

नित ले आनंद नित्यानंद

खुल गयी लुंगी गिर गयी चड्ढी, जैसे मिली कुत्ते को हड्डी.

गिर गए जनता की नजर में, जब मिले बाबा बिस्तर में,

एक भक्तिन संग खेले कबड्डी.

नित ले आनंद नित्यानंद, फैलाया वासना का गंद,

चरित्र से निकले फिसड्डी.

किया उदघाटन काट के फीता, जब आई भक्तिन रंजीता,

न खर्च की नोटों की गड्डी.

जब पड़े ऐसे बाबा से पाला, सर मुंडा करो मुंह काला,

बना दो इसको शिखंडी.

Published in: on मार्च 17, 2010 at 4:09 अपराह्न  टिप्पणी करे  

तू जनता लाचार

मैं शरद पंवार तू निपट गंवार,

मैं कृषि मंत्री तू जनता लाचार.

मेरे मुंह में केंसर, मेरी नस में कोढ़,

फिर भी मुझ को लोभ, नेताओं में बेजोड़.

मुझे करना है शुगर लाबी को संतुष्ट,

चीनी हो गयी महंगी, चीखे जनता दुष्ट.

हो गए गर देश में, दुर्लभ आलू प्याज,

खाने को मिलते नहीं, दाले और अनाज.

 सब परदेस भेजा, बढ़ा एक्सपोर्ट रेवेन्यु,

साथ ही बढे देखो, करप्शन के अवेन्यु.

ओ किसान किया तुझे, प्रारब्ध के हवाले,

पहले हम नेता खा लें, फिर तुझको टुकड़ा ड़ाले.

न सहन हो भूख तो परामर्श ये मान,

कर सुसाइड हो देश के लिए बलिदान.

वादा है संसद में तुझपे करेंगे चर्चा,

तेरी मातम पुरसी पे होंगे करोडो खर्चा.

तेरी दशा पर हम नेता सिद्धांतो पे अडेंगे,

बयान देंगे आपस में कुत्तों  की तरह लड़ेंगे.

ओ जनता मान मेरा आभार.

मैं शरद पंवार तू निपट गंवार,

Published in: on मार्च 12, 2010 at 8:29 अपराह्न  टिप्पणी करे  

मौज कर रहे नित्यानंद

दरवाज़ा खुल्ला आँखे बंद, मौज कर रहे नित्यानंद.

मिलेंगे ऐसे बहुत जमूरे, अकल के अंधे गाँठ के पूरे.

करो दो-चार लाख इकट्ठे, भारत में उल्लू के पट्ठे.

उनको दो ऐसे उपदेश, भक्त बन जाएँ देश विदेश.

फिर उनके पैसे पर अय्याशी, रोज कर रहे नित्यानंद.

मूर्खों के लगे अम्बार, एक ढूंढो मिले हज़ार.

नित करे कपट और बेइमानी, मन में अशांति और ग्लानि.

जब न सहन  हो निज आचरण, ढूंढें किसी बाबा की शरण.

ऐसे योग्य शिष्यों की, खोज कर रहे नित्यानंद.

पढ़ाई लिखाई सब बकवास, जरूरी केवल अंध-विश्वास.

किये ऐसे कर्म, किस्मत को कोसा, इश्वर का भी नहीं भरोसा.

ये सोच रहे बौद्धिक कंगाल, सब कष्ट हरे गुरु घंटाल.

ऐसी कष्टित निर्वसना संग, भोज कर रहे नित्यानंद.

काम देव के मन पसंद, मौज कर रहे नित्यानंद.

Published in: on मार्च 7, 2010 at 12:48 अपराह्न  Comments (1)  

आया घुटनों के बल …

आया घुटनों के बल, सिब्बल, मैडम के दरबार,

उसको समझे श्रीफल, मिले अगर दुत्कार.

इनकी है नीयत स्पष्ट, करेंगे शिक्षा पद्धति भ्रष्ट,

ताकि नेताओं के पिल्लै, पढ़े लिखों में हों शुमार.

मैडम का दिल नरम, रिमेम्बर, है वो PETA की भी मेंबर,

उसे कीड़ो से हमदर्दी, उसको जानवरों से प्यार.

वो देखो सुशिल कुमार शिंदे, उम्मीद में अब तक जिन्दे,

बन जाएँ कहीं गवर्नर, उनका भी हो बेडा पार.

उधर है पिंजरे में बंद, नाम है शर्मा आनंद,

इनकी नीयत में है गंद, इनकी हरकतें बेकार.

एक सींग और मोटी खाल, उकडू बैठे जायसवाल,

नहीं फ़ालतू, ये हैं पालतू, भले न हों टाँगे चार.

बन्दर को भी देते मात, उछल कूद में कमल नाथ,

इनके करतब चौकस, पाए मैडम का दुलार.

ये हैं हर संकट के दरजी, सोच में बैठे प्रणब मुखर्जी,

दुसरे फाड़ें, ये करें रफू, इन पर भरोसा अपार.

धोती पहने, न पहने पेंट नी, गुप चुप बैठे ए के एंटनी,

खच्चर जैसा ढ़ो लेते, मैडम जो दे दे भार.

कहें भारत में जिसे कांग्रेस, सिर्फ ‘Con men’ नहीं है ग्रेस,

साठ साल से लूट लूट, किया भारत का बंटाधार.

जिसकी चर्चा हो दुनिया भर, ये वो मैडम का चिड़ियाघर,

भोली भारत की जनता, कह देती इसको सरकार.

Published in: on मार्च 6, 2010 at 1:47 अपराह्न  टिप्पणी करे  

रानी बड़ी सयानी

फ्रांस की रानी बड़ी सयानी,

बात है तीन सौ साल पुरानी.

भूख से बेहाल था फ्रांस,

जनता की अटकी थी सांस.

गोदामों में लगे थे ताले,

रोटी के पड़े थे लाले.

जब और न हुआ सहन,

सर पे अपने कफ़न पहन.

जनता ने की एक पहल,

जा घेरा रानी का महल.

हाथ जोड़ कर की विनती,

खाने को रोटी नहीं मिलती.

देखो रानी कितनी भोली,

अपनी जनता से वो बोली.

इस समस्या का हल है एक,

रोटी नहीं तो खाओ केक.

फ्रांस जैसी आज अपनी कहानी,

दिल्ली में बैठी है रानी.

इटली से आती उसकी रोटी,

सिसली से आता उसका पानी.

जनता की थाली है खाली,

नल से बेहतर है नाली.

रानी अच्छी है दिल से,

उठ के भांडों की महफ़िल से.

ये नसीहत जनता को दी,

गाली खा और आंसू पी.

क्यों चाहे पेट्रोल और डीजल,

तेरे लिए केवल जीवनजल.

तेरे त्राण की है तैयारी,

संसद में बहस है जारी.

प्रणब डा के बजट का पोथा,

गरीब जनता का कर दे चौथा.

इस रानी की खूबी एक,

काम कैसे भी, पर नीयत नेक.

जनता मरे दाम के गम से,

या किसी नामालूम बम से.

रानी झट देती परमीशन,

बैठाती एक जांच कमीशन.

फिर भी करते कुछ अहमक,

रानी की नीयत पर शक.

कह गए ये संत और ग्यानी,

कोई नृप होय हमें का हानि.

भारत की रानी बड़ी सयानी,

बात ये दुनिया ने मानी.

Published in: on मार्च 4, 2010 at 7:25 अपराह्न  Comments (1)