बीड़ी का रैपर

लाला गेंदामल ने खोला बीड़ी का कारखाना,

बीड़ी के प्रचार को एक माडल था ढूंढ़वाना.

उनके एक साथी ने दारासिंह को किया रेफर,

दारा का फोटू खिंचवा छपवाए बीड़ी के बैनर.

अगले दिन बीड़ी के बण्डल बाज़ार गए बिकने,

बीड़ी तो कोई न ख़रीदे पर सब लगे हंसने.

तभी दारा लाला के पास पहुंचा गुस्से से लाल,

पकड़ लाला का गट्टा बोला — तेरी ये मजाल.

लाला रह गया भौंचक्का उसे माजरा समझ न आया,

तब दारासिंह ने उसे बीड़ी का रैपर दिखलाया.

ऐसी प्रिंटिंग मिस्टेक थी कि लाला ने पकड़े कान,

“पहलवान छाप बीड़ी” कि जगह था “बीड़ी छाप पहलवान”.

 

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Published in: on नवम्बर 18, 2012 at 1:02 अपराह्न  Comments (1)  

कवि सम्मलेन ले के बेलन …

कवि सम्मलेन ले के बेलन जा पहुंची एक नार,

भ्रकुटि उसकी भीम-गदा सी, जीभ तेज तलवार.

 

गरज के बोली कहाँ छुपा है निकम्मा मेरा दूल्हा,

जिसकी फूहड़ कविताओं से जलता मेरा चूल्हा.

 

कवि छुपा था मंच के नीचे अपनी आँखें मीचे,

आगे  श्रोता  जोर  लगाएं  पीछे  पत्नी  खींचे.

 

 हास्य रस का कवि भी देखो रोता अपने दुखड़े,

खींचतान  में  बेचारे  के  हो  गए  दो  टुकड़े.

 

एक टुकड़ा अब चूल्हा फूंके पत्नी-पाँव दबाये,

दूसरा  जूते  खाने  को कवि सम्मलेन जाये.

Published in: on सितम्बर 14, 2011 at 12:09 अपराह्न  Comments (1)  

वीर तुम बढ़े चलो

 वीर तुम बढ़े चलो,

धीर तुम बढ़े चलो,

सुधीर तुम बढ़े चलो,

समीर तुम बढ़े चलो,

बाकी सब पीछे रुको.

 

सामने पहाड़ हो,

सिंह की दहाड़ हो,

मुंह में दुखती दाढ़ हो,

या पेट-दर्द प्रगाढ़ हो,

तुम बिलकुल न झुको.

 

प्रात हो या रात हो,

संग हो न साथ हो,

समझ न आती बात हो,

खाने घूंसे-लात हो,

तो फिर जम कर ठुको.

 

हाथ में ध्वजा रहे,

चलने की सजा रहे,

जीने में न मजा रहे,

सदा बारह  बजा रहे,

तो फिर चल भी चुको.

Published in: on सितम्बर 8, 2011 at 6:31 अपराह्न  टिप्पणी करे  

सम्राट की पहचान कर ले

(बच्चन जी की कविता “पूर्व चलने के बटोही…” से प्रेरित)

 

पूर्व सोने के निर्मोही, खाट की पहचान कर ले.

 खाट है निवाड़ की या लोहे का है पलंग,

चौड़ा है या एक करवट सोवे इतना तंग.

कंधे जितना ऊंचा है या चौकी जितना नीचा,

बिछी है उसपर चादर या की मखमल का गलीचा.

पूर्व सोने के …

 

दुबला पतला है या हट्टा कट्टा लम्बा चौड़ा,

अजनबी है या तुम्हारा दोस्त भी थोड़ा थोड़ा.

मोटा थुलथुल है या भाग के कर सकता है पीछा,

क्या सोच तूने मस्ती में उसका पायजामा खींचा?

पंगा लेने से पहले जाट की पहचान कर ले.

 

सिर्फ सस्ता माल है या मिलता है कुछ अच्छा भी,

ईमानदार है दुकानदार या नोच ले कच्छा भी.

रंगे हुए सब्जी-फल और लीद मिले मसाले,

घुन खाया गेहूं और कंकड़ वाली दालें.

सौदा लेने से पहले हाट की पहचान कर ले.

 

स्वार्थ  भांजने आये हो या आये कष्ट निवारण,

सच्ची श्रद्धा है मन में या भय है इसका कारण.

दो कौड़ी का बाबा है या नेता-सा अपराधी,

या बाहुबली के आगे तूने अपनी आन गवां दी.

शीश झुकाने से पूर्व, सम्राट की पहचान कर ले.

Published in: on जून 5, 2011 at 12:49 अपराह्न  टिप्पणी करे  

पव्वा पिला …

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो जादू, मैं दुनिया हिला दूं,

रात का सिकंदर, सुबह नाली में मिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो दम, मिटे सारे रंजो-गम,

बच्चों के भूखे पेट, मेरे पीने का सिला.

पव्वा पिला …

फटे चीथड़े पहन, रखी कोठरी भी रहन,

नशे में तो मैं जीत लाया था किला.

पव्वा पिला …

पी पी के शराब, किये गुर्दे भी खराब,

न पीता तो खुद ही दबा देता अपना गला.

पव्वा पिला …

 है आठों पहर, ये जिंदगी जहर,

इस पीड़ा से तू मुझे मुक्ति दिला.

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

Published in: on अप्रैल 29, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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सृजन शीलता का कीड़ा

सृजन शीलता का कीड़ा, मुझे दे रहा पीड़ा,

कविता लिखने का मैंने उठा लिया बीड़ा.

मन में भाव नहीं, देह में घाव नहीं,

छंद लय की समझ, मुझे रत्ती पाव नहीं.

 स्मृति से फरियाद करूं, क्या भूलूँ क्या याद करूं,

भाव चिंतन, छंद निर्माण, क्या पहले क्या बाद करूं.

गद्य में लिखूं विचार, सुधारूं उनको बार बार,

फिर ढालूँ छंद में, तब हो कविता तैयार.

पर लाऊं कहाँ से कथ्य सखे, कथ्य जो हो सत्य सखे !

सत्य है अपथ्य किन्तु, पथ्य है असत्य सखे !

ये क्या अनर्गल प्रलाप, कैसी है ये लाचारी,

शब्दों के दावानल में, झुलस गयी कविता बेचारी.

Published in: on अप्रैल 2, 2010 at 7:16 अपराह्न  Comments (1)  

सुरती खा के फुर्ती आये

सुरती खा के फुर्ती आये, जोश भरे दारु,

कैसे खुद को सुधारुं.

मन मेरा तभी हो चैतन्य, जब दम सुल्फे के मारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

प्राण मेरे गुटके में अटके, चूना लगे चारू,

कैसे खुद को सुधारुं.

आठ पेग पी ऐसे चलूँ, चले जैसे कंगारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

कभी कलाकार न बना, रहा सदा आडू,

कैसे खुद को सुधारुं.

 नशे को बेचे बोरिया बिस्तर, बिक गया झाडू,

कैसे खुद को सुधारुं.

इस खातिर घर गिरवी रखा, कैसे कर्ज उतारूँ,

कैसे खुद को सुधारुं.

गल गए किडनी लीवर, अंत अपना विचारू,

कैसे खुद को सुधारुं.

लगा घुन्न, चेतना सुन्न, सदा शून्य में निहारूं,

कैसे खुद को सुधारुं.

 नशे ने नहीं है सुख, न शेखी बघारुं,

कैसे खुद को सुधारुं.

मुझसे सबक ले दुनिया, न पिए कभी दारु,

कैसे खुद को सुधारुं.

Published in: on मार्च 31, 2010 at 2:30 अपराह्न  Comments (1)  

ये कविता मेरी नहीं

ये मानने में देरी नहीं है, ये कविता मेरी नहीं है.

नहीं मालूम ये किसने लिखी, मुझे सामने पड़ी दिखी.

पहले मन में हुआ संकोच, फिर उठा लिया कुछ सोच.

नहीं काबू में रही जिज्ञासा, खोल इसे पढ़ा थोडा सा __

“नारी तुम केवल अद्धा हो, नशा देती हो पल में,

कहीं मिलती हो थैली में, कहीं मिलती हो बोतल में.”

इतना उनको हुआ अवसाद, रो पड़े जयशंकर प्रसाद.

किसने बनाई इनती भोंडी, उनके काव्य की पैरोडी.

लगा झटका इतना तगड़ा, इस से आगे नहीं पढ़ा.

तत्काल निर्णय एक लिया, उसे वहीं फाड़ के फेंक दिया.

पता नहीं क्या लिखा था शेष, जो पढ़ा, आपको किया है पेश.

Published in: on मार्च 28, 2010 at 2:20 अपराह्न  Comments (1)  

मेरे सर के बाल झड़ते

जैसे पतझड़ में उपवन के, फूल पीले लाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे आंधी तूफानों में, पात पेड़ के डाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे जिज्ञासु के श्रीमुख से, अधकचरे सवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे बेमानी मुद्दों पे, शहर शहर बवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे उम्र की झाडी से, नाकामी के साल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे फर्जी तेल बेच के, वैद्य गंजों का माल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

Published in: on फ़रवरी 7, 2010 at 9:50 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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जुकाम ने किया नाकाम.

जुकाम ने किया नाकाम.

माथे में जकडन, पीठ में अकडन,

बदन में हरारत, वाइरस की शरारत,

बैचेनी ही बैचेनी, पल भर न आराम,

जुकाम ने किया नाकाम.

गले में बलगम, नाला बहे नाक में,

बोलते बोलते, खांस दूं छपाक से,

लोग बाग़ करें, दूर से सलाम,

जुकाम ने किया नाकाम.

कहें डाक्टरी मिजाज, है जुकाम ला-इलाज,

चार दिन पले, फिर खुद ही टले,

उन चार दिनों में, हो जीना हराम,

जुकाम ने किया नाकाम.

Published in: on फ़रवरी 4, 2010 at 1:59 अपराह्न  टिप्पणी करे