जनतंत्र में सबकी नीयत …

किसी नेता के खजाने से थैली निकली है,

देखो बाहर कहीं कोई रैली निकली है.

गुंडे, लुच्चे, बदमाश, निखट्टू होते हैं,

अब रैली में भाड़े के टट्टू होते हैं.

आना जाना खाना फ्री, सौ रुपैय्या रोज,

लड़ो, झगड़ो, चिल्लाओ, जितनी करो मौज.

रास्ता रोको बसें जलाओ, और दुकानें फूंको,

करो लूट-खसोट, लुच्चई का कोई न मौका चूको.

खुल जायेगी किस्मत जो पुलीस ने लाठी मारी,

निकम्मी सरकार से मिलेगा कम्पेंसशन भारी.

जनतंत्र में सबकी नीयत मैली निकली है.

देखो बाहर कहीं कोई रैली निकली है.

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Published in: on जुलाई 19, 2010 at 8:20 अपराह्न  Comments (2)  

ये भारत है, चुप रह हलकट!

ये गर्मी और बिजली का संकट,

ये भारत है, चुप रह हलकट!

जितनी बिजली होती पैदा,

उस से होता सबको फैदा.

आधी बिजली चोर को जाती,

चौथाई घूसखोर को जाती.

छठवां हिस्सा नेता खाते,

बाकी बची तो हम सब पाते.

जो नियम से भरते बिल,

वो नहीं बिजली के काबिल.

उसने ही बिजली का सुख पाया,

जिस पर कई करोड़ बकाया.

या चोरी की आदत डालो,

लाइन मैन को टुकड़ा डालो.

सीधा बंद धूप में जलता,

चोर के घर में ए. सी. चलता.

तू बैठ किनारे पोंछ पसीना,

सीख ले बिन बिजली जीना.

थानेदार बन बैठा गिरहकट,

ये भारत है, चुप रह हलकट!

Published in: on जुलाई 11, 2010 at 11:35 पूर्वाह्न  Comments (4)