क्यों पायी आज़ादी …

सभी किस्म के भारतीय रिच हो या पुअर,

सब घिन्नाये देख दिग्विजय सिब्बल जैसे सूअर.

 

मंत्री संत्री या दिल्ली में जो घेरे बैठे सचिवालय,

औकात बस इतनी साफ़ करें मैडम का शौचालय.

 

क्रूरता इनकी बेलगाम, लालच इनका अनंत,

लीबिया सूडान के तानाशाह इनके सम्मुख संत.

 

पापी है या कुटिल, या मूर्ख हिंद की जनता,

ऐसे नरक के कीड़ों को, कोई अँधा भी न चुनता.

 

लानत है उस बेबस पर, जो मुखिया-ए-सरकार,

कहने को ‘सरदार’ पर बिलकुल नहीं ‘असरदार’.

 

शोषित, कुपोषित, शापित, चिरकुट ये सोचता अक्सर,

क्यों पायी आज़ादी इस से अंग्रेज ही थे बेहतर.

Published in: on जून 6, 2011 at 11:17 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

सम्राट की पहचान कर ले

(बच्चन जी की कविता “पूर्व चलने के बटोही…” से प्रेरित)

 

पूर्व सोने के निर्मोही, खाट की पहचान कर ले.

 खाट है निवाड़ की या लोहे का है पलंग,

चौड़ा है या एक करवट सोवे इतना तंग.

कंधे जितना ऊंचा है या चौकी जितना नीचा,

बिछी है उसपर चादर या की मखमल का गलीचा.

पूर्व सोने के …

 

दुबला पतला है या हट्टा कट्टा लम्बा चौड़ा,

अजनबी है या तुम्हारा दोस्त भी थोड़ा थोड़ा.

मोटा थुलथुल है या भाग के कर सकता है पीछा,

क्या सोच तूने मस्ती में उसका पायजामा खींचा?

पंगा लेने से पहले जाट की पहचान कर ले.

 

सिर्फ सस्ता माल है या मिलता है कुछ अच्छा भी,

ईमानदार है दुकानदार या नोच ले कच्छा भी.

रंगे हुए सब्जी-फल और लीद मिले मसाले,

घुन खाया गेहूं और कंकड़ वाली दालें.

सौदा लेने से पहले हाट की पहचान कर ले.

 

स्वार्थ  भांजने आये हो या आये कष्ट निवारण,

सच्ची श्रद्धा है मन में या भय है इसका कारण.

दो कौड़ी का बाबा है या नेता-सा अपराधी,

या बाहुबली के आगे तूने अपनी आन गवां दी.

शीश झुकाने से पूर्व, सम्राट की पहचान कर ले.

Published in: on जून 5, 2011 at 12:49 अपराह्न  टिप्पणी करे