राष्ट्र-गान: मेरे देश की धरती

मेरे देश की धरती,

नेताओं के बोझ तले कुचली तिल तिल मरती,

मेरे देश की धरती.

 

ये बना वृहद पाखाना इस में सबने हग के जाना,

सुवरों की मौज हुई और सभ्य जनता सड़ती.

मेरे देश की धरती.

 

एक भडुआ सरदार जो बना इसका जमादार,

मैडम के चरणों में उसने पगड़ी अपनी रख दी.

मेरे देश की धरती.

 

बने इस के रखवाले सारे कुत्ते खुजली वाले,

भौंक रहे संसद में देख के सारी दुनिया हंसती.

मेरे देश की धरती.

 

अब उसकी क्या पूंछे जिसकी आँख के ऊपर मूंछे,

कुटिल सिबल ने शिक्षा की मां-बहिन एक कर दी.

मेरे देश की धरती.

 

 एक कांग्रेस का कांडा जिसका फूट गया है भांडा,

हरयाणे में उसने सबकी धोती खोल के धर दी.

मेरे देश की धरती.

 

भारत की कायर जनता जिस से और तो कुछ न बनता,

जो अन्याय से लड़ता ये निंदा उसकी करती.

मेरे देश की धरती.

 

लौंडा मंद-बुद्धि और फेल जिसकी मां के हाथ नकेल,

कल भारत का पी.एम. होगा ये सोच के रूह सिहरती.

मेरे देश की धरती.

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Published in: बिना श्रेणी on सितम्बर 8, 2012 at 3:13 अपराह्न  Comments (1)