कभी नरम नरम कभी गरम गरम

कभी नरम नरम कभी गरम गरम,

कठपुतली है ये चिदंबरम.

आन्ध्रा से बांद्रा, कोई पूछता नहीं,

क्या बयान दे कुछ सूझता नहीं,

गृहमंत्री बना देश की शरम.

वित्तमंत्री था तो आम जनता बेहाल,

मालामाल हुए शेयरों के दलाल,

महंगाई बेकाबू, किये ऐसे करम.

जब अमरीका ब्रिटेन के मंत्री चेताएं,

देश को खतरा है, ये भी दोहराएं,

या वो बोले जो बताए मोहतरम.

सिम्मी की चांदी, नाक्सालाईट की मौज,

कोई एक्शन नहीं, बैठकें हों रोज,

है शासन सजग, बने ऐसा भरम.

बहुत सह चुकी ये भारत की भीड़,

अब चाहे गृहमंत्री जिसकी हो रीढ़,

आज जन मन में ये इच्छा परम.

Published in: on फ़रवरी 24, 2010 at 10:28 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

अशोक चवन का चवनप्राश

अशोक चवन का चवनप्राश,

कोई सेन्स नहीं खाली बकवास.

        टेक्सी चालाक को मराठी जरूरी,

        शिव सैनिक को लाठी जरूरी,

        मुंबई का चाहे हो सर्वनाश.

कैसा मुख्य मंत्री, ले लोट ल्पाटे,

बयान बदले, थूक के चाटे,

चाहे हो जनता में उपहास. 

        एन सी पी, एम् एन एस, शिव सेना, कांग्रेस,

        सब एक थैली के, खाली अलग भेस,

        स्वार्थ के अंधे, लोभ के दास.

सारे नेता लम्पट, इतना तो सोंचे,

मुंबई के उद्योग को इतना न नोंचे,

चले गए गर सब एम् पी, गुजरात,

महाराष्ट्र के पिछवाड़े मार के लात,

फिर क्या लूटेंगे, फिर क्या बांटेंगे,

खाली मुंबई को नमक लगा चाटेंगे?

Published in: on फ़रवरी 22, 2010 at 3:28 अपराह्न  टिप्पणी करे  

अंग अंग पाखण्ड

अंग अंग पाखण्ड, रंग ढंग पाखण्ड,

मैं मध्यवर्ग का बुद्धिजीवी, मक्कारी में मार्तंड.

        कुछ आता नहीं, कुछ जाता नहीं, सच बलना भाता नहीं,

        मन, वचन और कर्म में, आपस में नाता नहीं,

आदर्शों से खोखला, आडम्बर में प्रचंड.

        करूं संसार से उम्मीद, बन जाए मेरा मुरीद,

        जो कुतर्क से न माने, उसको लूं मैं खरीद,

फिर भी न डिगे चरित्र से तो उसको दूं मैं दंड.

        मेरे मन में विकार, मेरे कलुषित विचार,

        कर्त्तव्य से करूं नित, मानसिक व्यभिचार,

मेरा विवेक तार तार, मेरी चेतना खंड खंड.

        मैं जिस थाली में खाऊं कई उसमे छेद करूं,

        क्षेत्र, जात, भाषा, आधारित भेद करूं,

मैं अपने अहम् को पूजू, करूं खुद को महिमा मंड.

        मेरी बातों में त्याग, परोपकार, मर्यादा,

        जो मुझको टुकड़ा डाले, बन जाऊं उसका प्यादा,

वो वसंत कहे तो वसंत, वो ठण्ड कहे तो ठण्ड.

Published in: on फ़रवरी 20, 2010 at 7:23 अपराह्न  Comments (1)  

हम भारत के नंगे …

हम भारत के नंगे, हम से न ले पंगे.

मेरा नाम राज ठाकरे,

दुनिया बोले मत काट रे.

                पहले निज चाचा को काटा,

                फिर यु पी बिहार को डांटा,

सब रोंके, न देश बाँट रे.

मेरा नाम के सी आर,

मुझसे कुछ कहना बेकार,

                न करो झूटी मिजाज पुरसी,

                दे दो मुख्य मंत्री की कुर्सी,

और न होता इंतज़ार.

अब देखो माया की माया,

यु पी को गटर बनाया,

                देखो इसके विकास की फुर्ती,

                लग रही मूर्ति पे मूर्ति,

जीते जी पत्थर चिनवाया.

ये कैसी शीला की लीला,

कब्जाया दिल्ली का हर टीला,

                कहाँ योजना, व्यवस्था कैसी,

                मास्टर प्लान की ऐसी की तैसी,

होने दो कोर्ट को लाल पीला.

मेरा नाम करूणानिधि,

बड़ी सरल है मेरी विधि,

                तमिल नाद का हर प्राचीर,

                मेरे बच्चों की जागीर,

उंगली टेढ़ी रहे या सीधी.

और भी हैं इस देश में नंगे,

बैठे हर प्रदेश में नंगे,

                ये सब अपना ही घर फूंके,

                आओ हम अब इन पे थूके,

ये सारे सियार हैं रंगे.

Published in: on फ़रवरी 16, 2010 at 4:00 अपराह्न  टिप्पणी करे  

नीचे पान की दूकान

नीचे पान की दूकान, ऊपर गोरी का मकान,

ये है मेरा हिंदुस्तान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

देखो सौ कड़ोड पनवाड़ी, खींचे उस गोरी की गाडी,

फिर भी मेरा भारत महान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

गोरी झांके खिड़की से, अपनी एक ही झिडकी से,

खींचे मनमोहन के कान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

गोरी का न्यारा है लाल, बांकी देखो इसकी चाल,

करेगा देश पर एहसान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

गोरी के चमचे लाचार, कहते जिसको हम सरकार,

इनको तू बेकार ही मान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

संघवी, सिब्बल, शीला, सोनी, इस तबेले के सब पोनी,

दंडवत लेट करे परनाम, ये है मेरा हिंदुस्तान.

पनवाड़ी पर दुनिया हंसती, तरह तरह के ताने कसती,

पर इतना नहीं समझती, अपनी गोरी है महान.

नीचे पान की दूकान, ऊपर गोरी का मकान,

ये है मेरा हिंदुस्तान, ये है मेरा हिंदुस्तान.

Published in: on फ़रवरी 16, 2010 at 2:00 अपराह्न  टिप्पणी करे  

खोले जाओ कालेज

                    जब न हो नालेज, खोले जाओ कालेज.

पहले लाला बेचते थे आटा, तेल, कपास,

नालायक आवारा बेटा छील रहा था घास,

धनीराम का बेटा है तो किस्मत अच्छी बेशक,

खोल इंजीनीयरिंग कोलेज बनाया उसे निदेशक.

मेज के नीचे से सरकाया ढेरो पैसा,

मान्यता मिलने में फिर विलम्ब कैसा,

भारत का भविष्य इतना है क्लीयर,

जितने नहीं चपरासी, उतने इंजीनीयर.

                    शिक्षा की गुणवत्ता को मार गया फालिज.

टीचर मिल जायेंगे, साठ रुपैय्या दर्जन,

जब चाहे निकाल दो, थाम के गर्दन,

क्या क्या रफू करेंगे, ये शिक्षा के दरजी,

किसको फुर्सत देखे डिग्री असली है या फर्जी.

बेच देश की साख, घर अपना भरोगे,

भारत के नीति नियंता, कितना और गिरोगे,

कितना और जियोगे, इस दुनिया फानी में,

जा के डूब मरो, चुल्लू भर पानी में.

                    धिक्कार है निर्ल्लज, धिक्कार है निर्ल्लज.

Published in: on फ़रवरी 11, 2010 at 2:41 अपराह्न  टिप्पणी करे  

‘विद्रूप हास्य’ काव्य : प्रस्तावना

हिंदी साहित्य के युगों से सभी परिचित हैं, जैसे आदिकाल, भक्तिकाल, छायावाद, प्रगतिवाद, आदि. पर ये वो काल हैं जिन्हें समाज और साहित्य के द्वारा मान्यता मिली.

पर साहित्य (और काव्य) के कई वाद ऐसे हैं जो अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं समाज और साहित्य के ठेकेदारों से. प्रगतिवाद में जब छायावाद से बलात्कार किया को ‘विद्रूप हास्य’ पैदा हुई. इससे साहित्य में वो स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था.

‘विद्रूप हास्य’ काव्य में भावना प्रगति वाद की और छंद छायावाद के होते हैं. विद्रूप हास्य की वैध बड़ी बहिन ‘नयी कविता’ है, जिसमे छंद प्रगतिवाद के (छंद-विहीन) और भाव छायावाद के होते हैं.

विद्रूप हास्य की प्रतिनिधि कविता : मेरे सर के बाल झड़ते

Published in: on फ़रवरी 9, 2010 at 4:22 अपराह्न  टिप्पणी करे  

मेरे सर के बाल झड़ते

जैसे पतझड़ में उपवन के, फूल पीले लाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे आंधी तूफानों में, पात पेड़ के डाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे जिज्ञासु के श्रीमुख से, अधकचरे सवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे बेमानी मुद्दों पे, शहर शहर बवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे उम्र की झाडी से, नाकामी के साल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे फर्जी तेल बेच के, वैद्य गंजों का माल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

Published in: on फ़रवरी 7, 2010 at 9:50 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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जुकाम ने किया नाकाम.

जुकाम ने किया नाकाम.

माथे में जकडन, पीठ में अकडन,

बदन में हरारत, वाइरस की शरारत,

बैचेनी ही बैचेनी, पल भर न आराम,

जुकाम ने किया नाकाम.

गले में बलगम, नाला बहे नाक में,

बोलते बोलते, खांस दूं छपाक से,

लोग बाग़ करें, दूर से सलाम,

जुकाम ने किया नाकाम.

कहें डाक्टरी मिजाज, है जुकाम ला-इलाज,

चार दिन पले, फिर खुद ही टले,

उन चार दिनों में, हो जीना हराम,

जुकाम ने किया नाकाम.

Published in: on फ़रवरी 4, 2010 at 1:59 अपराह्न  टिप्पणी करे  

दांत दर्द

दांत दर्द दांत दर्द, सूजा गाल चेहरा सर्द.

जब दर्द हो दांत में, पचता नहीं कुछ आंत में,

 यहाँ गिरे वहां गिरे, घर भर में कूदे फिरे,

क्या औरत, क्या मर्द.

दांत दर्द दांत दर्द …

दर्द दांत का अनोखा, अन्दर से खाली खोखा,

लुप लुप हो जब दाढ़ में, दुनिया जाये भाढ़ में,

आँखें नम, आंसू सर्द.

दांत दर्द, दांत दर्द …

दांत दर्द में सब बेजान, क्या खड़क सिंह क्या तुर्रम खान,

एक दांत की नींव क्या टीसी, हिल गई सारी बत्तीसी,

दांत दर्द है दहशतगर्द.

दांत दर्द, दांत दर्द …

Published in: on फ़रवरी 1, 2010 at 11:26 पूर्वाह्न  Comments (2)