किताब री किताब

किताब री किताब, मुझको दे जवाब,

मेरी जिंदगी को किया क्यूँ खराब?

मैंने देखे पेड़, मैंने देखे खेत,

मैंने देखे दरिया, मैंने देखि रेत,

सब में प्रकृति की सुन्दरता बे-हिसाब,

किताब री …

मैंने देखा चंदा मैंने देखे तारे,

उड़ाई कभी पतंग, और कभी गुब्बारे,

इन के साथ मैं भी, उड़ता रहा जनाब,

किताब री …

मैंने देखी  धूप मैंने देखी छाँव,

सुनी कोयल की कूक, और कव्वे की कांव,

 जिन्न और परियों के देखे कई ख्वाब.

किताब री …

मैंने देखे दिन मैंने देखी  रात,

कबूतर की कातरता और बिल्ली की घात,

कभी डर के देखा कभी हो के बेताब.   

किताब री …

मैं हंसा खिल-खिल, मैं रोया जार जार,

कभी किनारे बैठा, कभी उतरा मझधार,

हर एहसास में था एक तजुर्बा नायाब.

किताब री …

इतने अनुभव जब जीवन में थे संभव,

क्यूँ सृष्टि में हुआ पुस्तक का उद्भव!

जब हाथ आई पुस्तक हुए बंद सभी द्वार,

बस खिड़की से जग के करने हैं दीदार,

खेलने पर प्रतिबन्ध, हुई सैर भी बंद,

गुम हुआ बच्चे के जीवन से आनंद.

कमर हुई टेढ़ी आँखों में लगा चश्मा,

अब बाँध न पाऊं अपने जूते का तस्मा,

मन में चिंता भारी कंधे पे बस्ता भारी,

जेल सी सकूल की ऊंची चारदीवारी,

किताब है जरूरी पर दवा के मानिंद,

 बरतें सिर्फ उतनी की जी उठे जिन्द.

जिंदगी की जंग में जो माँ-बाप हैं नाकाम,

बच्चे में निकाले अपने अधूरे अरमान,

क्यूँ मेरे बचपन पर मेरा हक नहीं,

मैंने ये समाज से माँगा है जवाब, किताब री …

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Published in: on सितम्बर 12, 2010 at 2:37 अपराह्न  Comments (5)  
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