कवि सम्मलेन ले के बेलन …

कवि सम्मलेन ले के बेलन जा पहुंची एक नार,

भ्रकुटि उसकी भीम-गदा सी, जीभ तेज तलवार.

 

गरज के बोली कहाँ छुपा है निकम्मा मेरा दूल्हा,

जिसकी फूहड़ कविताओं से जलता मेरा चूल्हा.

 

कवि छुपा था मंच के नीचे अपनी आँखें मीचे,

आगे  श्रोता  जोर  लगाएं  पीछे  पत्नी  खींचे.

 

 हास्य रस का कवि भी देखो रोता अपने दुखड़े,

खींचतान  में  बेचारे  के  हो  गए  दो  टुकड़े.

 

एक टुकड़ा अब चूल्हा फूंके पत्नी-पाँव दबाये,

दूसरा  जूते  खाने  को कवि सम्मलेन जाये.

Published in: on सितम्बर 14, 2011 at 12:09 अपराह्न  Comments (1)  

वीर तुम बढ़े चलो

 वीर तुम बढ़े चलो,

धीर तुम बढ़े चलो,

सुधीर तुम बढ़े चलो,

समीर तुम बढ़े चलो,

बाकी सब पीछे रुको.

 

सामने पहाड़ हो,

सिंह की दहाड़ हो,

मुंह में दुखती दाढ़ हो,

या पेट-दर्द प्रगाढ़ हो,

तुम बिलकुल न झुको.

 

प्रात हो या रात हो,

संग हो न साथ हो,

समझ न आती बात हो,

खाने घूंसे-लात हो,

तो फिर जम कर ठुको.

 

हाथ में ध्वजा रहे,

चलने की सजा रहे,

जीने में न मजा रहे,

सदा बारह  बजा रहे,

तो फिर चल भी चुको.

Published in: on सितम्बर 8, 2011 at 6:31 अपराह्न  टिप्पणी करे