पव्वा पिला …

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो जादू, मैं दुनिया हिला दूं,

रात का सिकंदर, सुबह नाली में मिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो दम, मिटे सारे रंजो-गम,

बच्चों के भूखे पेट, मेरे पीने का सिला.

पव्वा पिला …

फटे चीथड़े पहन, रखी कोठरी भी रहन,

नशे में तो मैं जीत लाया था किला.

पव्वा पिला …

पी पी के शराब, किये गुर्दे भी खराब,

न पीता तो खुद ही दबा देता अपना गला.

पव्वा पिला …

 है आठों पहर, ये जिंदगी जहर,

इस पीड़ा से तू मुझे मुक्ति दिला.

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

Published in: on अप्रैल 29, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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लेना एक न देना दो

अक्कड़ बक्कड़ बाम्बे बो,

लेना एक न देना दो.

छत्तीसगढ़ में नक्सल वादी, सत्तर ने जहां जान गवां दी,

नेता साले बेचे तेल, खेलें इस्तीफे का खेल,

दिल्ली में क्यों हलचल हो,

लेना एक न …

बच्चों को कैसे दे शिक्षा, यूपी बिहार मांगे भिक्षा,

युवक देश का जैसे गिरगिट, गुटका खा के देखे किरकिट,

फिर लम्बी तान के सो,

लेना एक न …

हैती, चिली में आये जलजला, मरें लाखों लोग तो मेरी बला,

मुझको प्यारी मेरी बीयर, शाम ढले ही बोले चीयर,

मत दूजे के दुःख में रो,

लेना एक न …

डूबे देश की इकानामी, इसमें भला मेरी क्या खामी,

मैंने जोड़ा काला पैसा, पर इसमें अफ़सोस कैसा,

जिसने न जोड़ा मूरख वो,

लेना एक न …

मरे गरीब बीमारी से, या किसी लाचारी से,

या महंगाई को रोवे, रोज आधा पेट ही सोवे,

तू पूरा पव्वा पी के सो,

लेना एक न …

नित बढ़ रहा पोलुशन, नहीं मिलता कोई सोलुशन,

कैसी हमने की नादानी, नहीं बचे हवा और पानी,

कल क्या होगा न सोचो,

लेना एक न …

बढ़ रही गर्मी की मार, सूरज से बरसे अंगार,

मान ले ये मेरी थ्योरी, तू भी कर बिजली की चोरी,

जो भी होना है वो हो,

लेना एक न …

मेरी बस इतनी कम्प्लेंट, मुझे मिले मेरा इन्क्रीमेंट,

मिल जाए अगर प्रोमोशन, जाग जाएँ मेरे इमोशन,

देश की चिंता है किसको,

लेना एक न …

हम बेशर्म देश के बन्दे, केवल अपने स्वार्थ में अंधे,

क्यों तू अपने को कोसे, भारत है भगवान् भरोसे,

दोष भी भगवान् को दो,

लेना एक न …

Published in: on अप्रैल 21, 2010 at 12:00 अपराह्न  टिप्पणी करे  

कहे थरूर

 

चल पुष्कर को खुश कर,

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

ये हमारे फारेन मिनिस्टर,

प्लान इनके इतने सिनिस्टर,

सोनिया भी बोले बस कर,

फिर भी इतना गरूर, 

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

किरकिट को लगा था बट्टा,

पहले भी लगता था सट्टा,

अब डायरेक्ट घुस आये तस्कर,

होने को मशहूर, 

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

भारत का अब ऐसा हाल,

मंत्री सिर्फ टीम का दलाल,

सौदेबाजी करता अक्सर,

लालच से मजबूर,

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

बता दो कहाँ से लाये भैय्या,

ये हज़ारों करोड़ रुपैय्या,

रो कर बोलो या हंस कर,

बता भी दो हुज़ूर,

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

देश में आती जो ब्लेक मनी,

हथियारों की है आमदनी,

लाते मौत के सौदागर,

नेता इनके मजदूर,

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

लगेंगे सबको बोल ये कडवे,

किरकिट के जितने हैं भडुवे,

लानत भेजो इन सब पर,

ये अपराधी क्रूर,  

कहे थरूर, जरूर, जरूर.

Published in: on अप्रैल 19, 2010 at 11:45 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

चल अमरीका

चल अमरीका, चल अमरीका,

यहाँ सब लागे फीका फीका.

चल अमरीका …

घर में बिजली न नल में पानी,

हर धंधे में सिर्फ बे-इमानी,

सब्जी में रंग, लीद मसाला,

नकली दूध जहर का प्याला,

खटारा बसें सडको पे गड्ढे,

कालेज के बाहर, जुए के अड्डे,

मंत्रालय में डाकू थाने में चोर,

दफ्तर में बैठे रिश्वत खोर,

बेशर्म  दलाली के औजार,

इतने घटिया हैं अखबार,

झेल न सकते इनको दो पल,

हास्यास्पद सब टी वी चेनल,

बीस रूपये में बिके क़ानून,

पेशकार को है  मालूम,

प्रतिभा बनी गले का फंदा,

नेता करें जात का धंधा,

लड़े बिहारी और मराठी,

लेके चाक़ू, डंडा, लाठी,

ठोकें खुद ताबूत पे कीला,

सबका अपना एक कबीला,

नियम मानना है कमजोरी,

चोर करे सब सीना जोरी,

हर कोई प्रेम भाव से खाली,

दिल में नफरत मुंह में गाली,

प्रजातंत्र में सबको छूट,

जो भी लूट सके वो लूट,

समझोतों की ये लाचारी,

मुंह में राम दिल में मक्कारी,

कर न पाऊं अंतर मैं,

ये भारत है या अफ्रीका.

चल अमरीका, चल अमरीका,

यहाँ सब लागे फीका फीका.

अमरीका में ये अच्छाई,

दिल की बात जुबान पे आई,

न दोगले आदर्श वो लिखते,

जैसे हैं वैसे ही दिखते,

नियम माने, क़ानून से डरते,

जैसे नियम वैसा ही करते,

दफ्तर में पाने काम के पक्के,

छुट्टी में आराम के पक्के,

एक दूजे से न ले पंगे,

चाहे बीच पर घूमे नंगे,

कभी कोई सिग्नल न चूकें,

क्या मजाल जो सड़क पे थूकें,

सब जगह सुलभ बिजली और पानी,

यात्रा में नहीं कोई परेशानी,

न कोई जमघट न कोई हल्ला,

प्यार करें सब खुल्लम खुल्ला,

यह सुख सब पाना चाहते,

अमरीका सब आना चाहते,

इसे कोसे वो उल्लू के पट्ठे,

जिनके लिए अंगूर हैं खट्टे,

जय अमरीका जय अमरीका,

मैं आने का ढूंढूं तरीका,

जय अमरीका जय अमरीका,

तेरा भक्त नहीं कोई मेरे सरीखा,

जय अमरीका जय अमरीका.

तेरे दर गर आ जाऊं तो,

जलाऊं दिया असली घी का,

जय अमरीका जय अमरीका.

Published in: on अप्रैल 18, 2010 at 2:51 अपराह्न  टिप्पणी करे  

कीचड कुश्ती

आओ खेले कीचड कुश्ती, खूब करे फिर धींगा मुश्ती.

कह रहे डॉक्टर चच्चा, कीचड में खेले हर बच्चा,

हो फिर चुस्त, भागे सुस्ती, आओ खेले …

 सेहत का हर खोट भगाए, नाले में चल लोट लगाए,

मुफ्त पाए तंदरुस्ती, आओ खेले …

हम भारत के बच्चे न्यारे, गटर में ही पलते सारे,

उसमे ही तैराते किश्ती, आओ खेले …

भारत एक सयाना देश, स्वस्थ रखे अपना परिवेश,

नाले मुफ्त कीचड सस्ती, आओ खेले …

संसद में चर्चा विशेष, देश में गटर या गटर में देश,

जनता रोवे किस्मत हंसती, आओ खेले …

Published in: on अप्रैल 12, 2010 at 12:53 अपराह्न  टिप्पणी करे  

कीचड के फायदे

Latest research reveals that the parents who let their children romp in the mud and eat food fallen on the floor actually are doing them good. They also found that ultra-clean environments are actually bad.

The good thing is that we all in India new about it since eternity. We beget children in India in slums, they grow up near veritable gutters, sometimes inside it: nothing to pity, we are doing them good. They eat food not only fallen on the floor, but also directly from garbage bins. How insightful and scientific we are !!!

And our leaders … they do anything to help our children … they have converted the entire country into gutter. And as for the benefits of mud, all the time they indulge in mud-slinging … inside and outside parliament. All our celebrities excel in muddy affairs and regularly indulge in mud-slinging.

So, long-live healthy India …. ये फिरंगी क्या सिखायेंगे हमें कीचड के फायदे …  हम तो दिन रात एक दूसरे पे कीचड ही तो उछालते हैं …

Published in: on अप्रैल 12, 2010 at 12:33 अपराह्न  टिप्पणी करे  

मद्य पी के गद्य लिखें …

मद्य पी के गद्य लिखें, सुट्टा लगा के लेख,

आज के रचनाकार की, देख प्रतिभा देख.

नित व्यवस्था को कोसे, नेताओं को दे गाली,

इसको चिंता होती देख, जनता की कंगाली,

हर योजना, हर नीति में निकाले मीन मेख,

आज के रचनाकार …

ये जतलायें जैसे देश की चिंता में हुए दुबले,

क्रांतिकारी लेख लिखें और गुस्से से उबलें,

ऐसे बने बहादुर ज्यों चिल्ली का शेख,

आज के रचनाकार …

मत पूछो इनसे क्या है इनकी जिम्मेवारी,

चरित्र इनका इतना हल्का, विचार जितने भारी,

चींटी से भी छोटी है, इनके ईमान की रेख,

आज के रचनाकार …

दुम हिलाते चलते पद्मश्री सम्मान के पीछे,

और भागे ये सरकारी अनुदान के पीछे,

न इनके सरोकार असली, न इनके इरादे नेक,

 आज के रचनाकार …

हो कोई भी आयोजन कोई सभा या कोई समिति,

इनकी आत्मा तडपे बनने को मुख्य अतिथि,

गिरगिट को भी मात करें, इतने बदले भेख,

आज के रचनाकार …

दावा करते ये बदलेंगे दुनिया का नक्शा,

पेशे से अध्यापक, पर कभी न जाते कक्षा,

ये है ऐसी छलनी जिसमे सौ सौ छेक,

 आज के रचनाकार …

इनसे रहा न जाये देते हर मुद्दे पर राय,

सबको समझें मूर्ख, खुद को समझे काय,

उसका पक्ष ले, पहुंचाय जो स्काच की बोतल एक,

देख के इनकी खूबी, साहित्य की लुटिया डूबी,

पत्रकारिता बनी दलाली, कविता बनी अजूबी,

इन कागज़ के शेरों को, चल भट्टी में फेंक.

Published in: on अप्रैल 8, 2010 at 11:09 पूर्वाह्न  Comments (2)  

कालिदास गए बनवास

तुलसी दास थर थर काम्पें, सूरदास की अटकी सांस,

मुझे कविता करते देख, कालिदास गए बनवास.

फूट गयी दांडी की हांडी, अश्वघोष भी हुए बेहोश,

 बहुमुखी प्रतिभा का विस्फोट, भवभूति को न आया रास.

विद्यापति को मनस्ताप, हुआ विशाखदत्त को सन्निपात,

माघ भूले फागुन राग, मूर्च्छित हो गए महाकवि भास.

शूद्रक अब बेंचे अदरक, वाचस्पति बेचें वनस्पति,

करने लगे कम्ब विलम्ब, वेद व्यास ने लिया संन्यास.

वाल्मीकि पीयें फीकी चाय, पाणिनि के अष्ट अध्याय,

नवां अध्याय लिखना छोड़, वो भी ओटन लगे कपास.

कर गए पलायन पन्त तुरंत, लगा निराला को ताला,

हुए लुप्त मैथली शरण गुप्त, बैठे श्यामा चरण उदास,

भूल गए गान रसखान, भिखारी बने बिहारी,

रहम रहम रहीम पुकारे, कबीर का टूटा विशवास.

धर्मवीर भारती करें आरती, छूता नीरज का धीरज,

हुए निरुपाय हरिवंश राय, मुक्तिबोध को आया क्रोध,

जी रहे दिनकर दिन गिन कर, घिरे अवसाद से प्रसाद,

कहें संत है ये काव्य का अंत, प्रलय की घडी है पास.

Published in: on अप्रैल 6, 2010 at 12:38 अपराह्न  टिप्पणी करे  

सृजन शीलता का कीड़ा

सृजन शीलता का कीड़ा, मुझे दे रहा पीड़ा,

कविता लिखने का मैंने उठा लिया बीड़ा.

मन में भाव नहीं, देह में घाव नहीं,

छंद लय की समझ, मुझे रत्ती पाव नहीं.

 स्मृति से फरियाद करूं, क्या भूलूँ क्या याद करूं,

भाव चिंतन, छंद निर्माण, क्या पहले क्या बाद करूं.

गद्य में लिखूं विचार, सुधारूं उनको बार बार,

फिर ढालूँ छंद में, तब हो कविता तैयार.

पर लाऊं कहाँ से कथ्य सखे, कथ्य जो हो सत्य सखे !

सत्य है अपथ्य किन्तु, पथ्य है असत्य सखे !

ये क्या अनर्गल प्रलाप, कैसी है ये लाचारी,

शब्दों के दावानल में, झुलस गयी कविता बेचारी.

Published in: on अप्रैल 2, 2010 at 7:16 अपराह्न  Comments (1)  

भारत का बुद्धिजीवी

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

लोग हंसें, तंज कसें, नित धिक्कारे ओ दुत्कारे,

ये चिकना घड़ा, संयमी बड़ा, न हिम्मत हारे.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

न समाजवादी, न पूंजीवादी, मैं अवसरवादी,

दफ्तर में जब काम पड़े तो मैं अफ्सरवादी.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

सब सोचें मैं भारत उदय के सपने नित देखूं,

मूढ़ हैं साले, मैं केवल अपना हित देखूं.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

जब जाबर झुकने को बोले, मैं लेट जाऊं,

कमजोर को मैं डंडा मारूं, बेंत लगाऊं.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

पब्लिक में मैं सामजिक समता का हामी,

निजी जीवन में मुझसे बड़ा नहीं हरामी.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

व्यवस्था को बदल डालो मैं सबको डांटू,

सत्ताधीशों के संग बैठा उनके तलुए चाटूं.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझे परजीवी.

जान बूझ के आग चढाऊं काठ की हांडी,

मैं संसार का सबसे बड़ा धूर्त, पाखंडी.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

मिडिया, कालेज, NGO, घेरे सारे मंच,

डटा रहूँगा जब तक चले मेरा प्रपंच.

मैं भारत का बुद्धिजीवी, सब समझे मुझको परजीवी.

Published in: on अप्रैल 1, 2010 at 3:22 अपराह्न  टिप्पणी करे