ये किसने फैलाया तेल

मची है देखो रेलमपेल, ये किसने फैलाया तेल?

सागर में भी तेल बरसे, अमरीका में निकले जिधर से,

कुछ लीटर भारत भिजवा दो, यहाँ हम बूँद बूँद को तरसें.

बस ईंधन का तेल नहीं, बाकी हर वसले का तेल,

माओवादी असले का तेल, भोपाल मसले का तेल.

रेडियो एक्टिव कबाड़ का तेल, अर्थ व्यवस्था उजाड़ का तेल,

एक दोगले वकील का देखो, शिक्षा से खिलवाड़ का तेल.

महंगाई की मार का तेल, विकट भ्रष्टाचार का तेल,

भुखमरी, गरीबी, लाचारी, मिलेगा हर प्रकार का तेल.

आज़ादी के बाद से खेलें, ये कोल्हू का खेल निराला,

साठ साल से नेताओं ने जनता का ही तेल निकाला.

जब कोल्हू में निर्धन पिसता है, खून नहीं आंसू रिसता है,

सत्ता है वो सान जिस पर, नेता निज चाक़ू घिसता है.

कचूमर निकल चुका जनता का, अब तो बंद करो ये खेल,

मची है देखो रेलमपेल, ये किसने फैलाया तेल!

Published in: on जून 20, 2010 at 10:30 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

भोपाल पर श्रगाल रूदन

मीडिया के कुत्ते भौंक रहें हैं,

नेता और समाज सेवी ताल ठोंक रहे हैं.

माध्यम वर्ग के दोगले बुद्धिजीवी —

जो सोये पड़े थे, जागे और चौंक रहे हैं.

करोड़ों का अखबारी कागज़ होगा बर्बाद,

दफ्तरों में बाबू करेंगे, काम छोड़ बकवाद,

फिर बैठेगी जांच और फिर होगी फ़रियाद,

सरकारी सुवरों और दलालों में बंटेगा प्रसाद.

फिर २५ साल बाद आएगा एक और verdict,

क्या उसका मजमून होगा हम कर सकतें है predict,

और तब तक मर चुके होंगे सारे convict,

हम भी हो चुके हैं इस व्यवस्था के addict.

अब इस तमाशे पर लगाओ लगाम,

बंद करो ढकोसला, लगो अपने काम,

मरने वाले मर गए उनको रोना छोडो,

है भारत के हर हादसे का यही अंजाम.

Published in: on जून 15, 2010 at 12:00 अपराह्न  टिप्पणी करे  

भोपाल भोपाल जय गोपाल

भोपाल भोपाल जय गोपाल.

२५ साल पहले यहाँ बरसा था काल,

जीते जागते लोग बन गए कंकाल,

 भोपाल भोपाल जय गोपाल.

कुछ घंटों में था भारत के बाहर,

इतनी तेज हो गयी एंडरसन की चाल.

कोई क़ानून न पहुँच पाया उस तक,

सत्ता  के कुत्ते बन गए उसकी ढाल.

ले के खड़े कंपनसेशन का कटोरा,

अमरीका से बोले प्रभु टुकड़ा तो डाल.

जुट गयी सब तरफ दलालों की भीड़,

सब साले नोचें भूखे-नंगो की खाल.

यूनियन  कार्बाइड तो डूब गयी बिक गयी,

कितने बिचोलिये हो गए मालामाल.

अपंगों की एक पीढ़ी गुजर गयी,

इतनी सुस्त पड़ गयी न्याय की चाल.

भोपाल ही नहीं हुआ था सिखों का नर-संहार,

बड़ा ही भयानक था सन ८४ का साल.

मौज कर रहे उन दंगो के मुजरिम,

दयनीय है दंगों की जांच का भी हाल.

हम बेशर्म भारतीय कभी न जागना चाहें,

समस्या हो चाहे कितनी विकराल.

वो हाथ अपना पिछवाडा खुजलायें,

जिन हाथों में होनी चाहिए थी मशाल.

बुझी बीड़ी जैसी अपनी युवा पीढी,

सामाजिक सरोकार को समझें जी का जंजाल.

चलो पूरा हो गया बौद्धिक विलाप का कोटा,

गर्म हो गयी दारु, थोड़ी बरफ तो डाल.

Published in: on जून 10, 2010 at 10:26 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

हिन्दू की परिभाषा

ब्रह्मपुत्र से सिन्धु, भटक गए सब हिन्दू.

हर नुक्कड़ पर बाबा, हर गली में आश्रम,

लगी हैं दुकाने, सब बेचें अपना धर्म.

सब और कोलाहल, लगा है एक तमाशा,

सबको विस्मृत क्या है, हिन्दू की परिभाषा.

सबका अपना स्वार्थ, लगी हुई है मंडी,

बैठा हर मठ के अन्दर एक पाखंडी.

“मैं ज्ञानी, मैं ध्यानी, मैं संत, मैं योगी”,

वानरों सा चीखें, भांति भांति के ढोंगी.

इस धर्म में मर्म है, कैसे हो विश्वास,

दुनिया भर में होता, हिन्दू का उपहास.

क्यों हम कमियां दूसरों की निकालें,

गिरने लगी दीवारें, अब अपना घर संभालें.

फिर नापेंगे धरा, और जीतेंगे अम्बर,

पहले दूर करें, धर्म से आडम्बर.

बिखरे पड़े देश में, काशी से कोलाबा,

कौन सा ज्ञान देंगे, ये अधकचरे बाबा.

निज बुद्धि से सोचो, अपने कर्म सुधारो,

ये बाबा निकृष्ट, इनको लात मारो.

छल, कपट, झूठ, घृणा और प्रतिशोध,

उत्थान के मार्ग के, ये पांच अवरोध.

हिंदुत्व नहीं है पूजा, न आरती की थाली,

न रिश्वत-सी मन्नत, जिसने मानी — पा ली.

ज्ञान, तर्क, श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया,

जिसने इनको माना, वो हिन्दू हो गया. 

मार्ग दर्शन को काफी, है गीता का ज्ञान,

ये सृष्टि उसी की, है कण कण में भगवान्.

कहाँ राह भूले थे, आज विचारें ये बिंदु.

ब्रह्मपुत्र से सिन्धु, राह आयें सब हिन्दू.

Published in: बिना श्रेणी on जून 2, 2010 at 4:52 अपराह्न  टिप्पणी करे