कुत्ता पाला, खुजली वाला

करुणानिधि ने कुत्ता पाला, खुजली वाला,

उसको दिल्ली ले के आये, मनमोहन लाला.

कुत्ते ने वो गंद मचाया, किया हर जगह गू,

पूरे भारत में फ़ैल गयी उसकी बदबू.

वहीं बैठा था एक स्वामी ध्यान लगाए,

इस बदबू ने उसके भी नथुने फढ़काए.

उसने मनमोहन को बोला इसे भगाओ,

इससे कहीं प्लेग न फैले देश बचाओ.

मनमोहन तो भैय्या कुर्सी के ऐसे पिस्सू ठहरे,

स्वामी के आगे बन गए जैसे गूंगे-बहरे.

स्वामी तब गुस्से में हो गए दुर्वासा,

मनमोहन की बत्ती गुल, फेंका ऐसा पांसा.

कलमाड़ी-राजा ने देश जैसा लूटा घनघोर,

हर्षद-तेलगी इनके आगे लगे चिंदी-चोर.

भारत चाहे कितनी भी कर ले तरक्की,

जब तक ये कीड़े जिन्दा, ज़लालत पक्की.

अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा,

कहीं ठिकाना नहीं मिले तो, आदर्श कोलोनी में घर ले, आजा.

 

चल पडा दब्बू सरदार, घोड़े पांच बंदूकें चार,

घुटनों  के बल मंत्री संत्री, मैडम का लगा दरबार.

 

नेता-अफसर खावें मोती, जनता एक रोटी को रोती,

करप्शन की कहाँ हद होती, कफ़न नोच के बांधे धोती.

 

शब्दहीन हो गया ये बन्दा, अर्थहीन हो गयी सब निंदा,

सारा देश है शर्मिंदा, सत्ता के सूवर क्यों जिन्दा.

 

मध्यवर्ग के भडुए जागो, ले के बोरिया बिस्तर भागो,

अमरीका में जा के दम लो, वहां से निज बौद्धिकता दागो.

 

हत्या, लूट, दगा, जालसाजी, सबको सबकी छूट,

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.

आदर्श कालोनी: आदर्श नगर

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

देश बेशक जाए पाताल में,

या फिर शत्रु के जाल में,

तीनो तीन से कदम ताल में,

भेडिये चले भेड़-खाल में,

नेता, अफसर, और कमांडर.

सीमा पर जो सिपाही सच्चे,

ठोकरें खाएं उनके बच्चे,

देश-हित में मरते मूरख,

विधवा उनकी झेले सौ दुःख,

आसरे को भटके दर-दर.

 सिपाही मरने जाए कारगिल,

कमांडर कब्जायें तीसवीं मंजिल,

जिनका चरित्र था इतना उज्जवल,

कितना गिर गए हैं ये जनरल,

 क्या होगा सेना पर असर.

चवन, छगन, देशमुख, शिंदे,

सारे इस नाली के गंदे,

लोभ में इतने हो गए अंधे,

बन गए शैतान के बन्दे,

निकृष्ट कर्म, आत्मा जर्जर.

अंधी लूट की बन्दर-बाँट,

फिर युवराज के तलुवे चाट,

फिर मैडम का गू खावें,

फुर्सत कहाँ जो राज चलावें,

बेबस जनता फोड़े अपना सर.

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.