काम करो, नाम करो …

काम करो,

नाम करो,

उसके बाद

आराम करो.

लो मकान

या दूकान

या कोई

और सामान 

सफ़ेद पैसे  से

दाम भरो.

उसके बाद …

खरीदो कार

या सरकार,

सैकेंड हैंड

या बेकार,

बदलने से

न डरो.

उसके बाद …

टी वी झेलो

बीवी झेलो,

या चाहे

बच्चों से खेलो,

दफ्तर में न

शाम करो.

उसके बाद …

खाओ खाना

न मनमाना,

सेहत देगी

फिर हर्जाना,

संयम को

सलाम करो.

उसके बाद …

दो हाथों से

बजती ताली,

न दो गाली

न लो गाली,

न सुख चैन

हराम करो.

उसके बाद …

न तू दाता

न विधाता,

तेरे बाप का

फिर क्या जाता?

अपनी मंशा

आम करो.

उसके बाद …

लाखों दुःख

मन को घेरे,

पर उपदेश

कुशल बहुतेरे,

चीयर्स बोल के

जाम भरो,

उसके बाद

आराम करो.

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Published in: on मई 30, 2010 at 1:18 अपराह्न  Comments (2)  

फिर न हो दुर्घटना पेश

एक जहाज उड़ा, गिरा, जला, बची राख, कुछ अवशेष,

कुछ जीवन मिटे, रुके, जो थे सगे, स्तब्ध अन्मेष.

यूँ तो होते रहते हादसे, न रुकते समाज, दुनिया, देश,

हर मोड़ पर छुपी मौत, लिए कितने रूप, धरे कितने वेश.

पर ऐसी घटनाएं छोड़े कितने अधूरे स्वप्न शेष,

है यही कामना, फिर न किसी पर हो ऐसी दुर्घटना पेश.

Published in: on मई 25, 2010 at 3:27 अपराह्न  टिप्पणी करे  

हाय राम जयराम

चीन के चूतड  चाटे भारत का नेता

किसी के कान जूँ न रेंगे, हाय  राम जय राम.

चीन बोले मेरा अरुणाचल, मैं लेता

नेता बोले सिक्किम भी देंगे, हाय  राम जय राम.

 चीन भारत को दो कौड़ी के भाव न देता

भारत बोले हम मुफ्त बिकेंगे, हाय राम जय राम.

माओ वादियों को हथियार भी चीन ही देता

हम उनके हाथों मरते रहेंगे, हाय राम जय राम.

सन ६२ में भारत हारा, था चीन विजेता

भारत बोले हम सबक न लेंगे, हाय राम जय राम.

जय राम रमेश बीजिंग जा के न छोड़े मौके,

चीन के तलवे चाटे और भारत पर भौंके.

मंत्रिमंडल में जब हो ऐसे देश द्रोही,

दोष देंगे सब दब्बू पी. एम. को ही.

इसको सज्जन कहने में अब होती पीड़ा,

कितना लाचार दिखता ये कुर्सी का कीड़ा.

सीमा पर नित कितने ही सैनिक मरते,

मुंबई में आतंकियों से भी लड़ते,

छतीस गढ़ के बीहड़  में भी वो ही मरते,

कश्मीर से कोहिमा तक वो ही मरते,

सत्ता के कुत्तों की वो रक्षा  करते,

संसद पर हमले में भी वो ही मरते.

हैरान बैठा आम आदमी ये सोचा करता,

क्यों कभी न किसी हमले में नेता मरता.

सैनिक खाए बन्दूक की गोली,

नेता खाए ताकत की गोली,

अकल की अंधी जनता भोली,

खाए  बैठी भांग की गोली.

Published in: on मई 23, 2010 at 1:05 अपराह्न  टिप्पणी करे  

अनूठे चिंतन का दौर

मेरे पावों तले आकाश है,

क्या ये स्थिति अनायास है?

क्या उड़ रहा किसी विमान में,

वातायन से झाँकूँ वितान में.

सोच रहा हूँ बड़ी देर से,

क्या लटका हूँ किसी पेड़ से?

क्या औंधा गिरा हूँ किसी नाले में,

या कीड़े-सा फंसा हूँ मकडी के जाले में.

हैरान हूँ अपने इस विचार पर,

क्या मर के खड़ा हूँ मुक्तक द्वार पर.

श्वान-सा ये कौन मेरे पास है,

क्या ये युधिष्ठिर  का बनवास है?

क्या और कोई संभावना है बाकी,

अब तू ही उलझन मिटा साकी.

जारी रहे अनूठे चिंतन का दौर,

इस बात पर हो जाए एक जाम और.

Published in: बिना श्रेणी on मई 12, 2010 at 9:47 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

IPL

 

हज़ारों दलाल, सटोरिये, नचनिये,

मीडिया और विज्ञापन की दुनिया के बनिये,

तीस-चालीस खिलाड़ी-नुमा मवाली,

सौ करोड़ मूर्ख, बजाने को ताली.

Published in: on मई 9, 2010 at 12:14 अपराह्न  Comments (4)  

संसद

जहां होना चाहिए था देश पर चिंतन गहन,

पर जहां नेता कर रहे एक दूसरे की मां-बहन.

Published in: on मई 5, 2010 at 4:17 अपराह्न  टिप्पणी करे