बीड़ी का रैपर

लाला गेंदामल ने खोला बीड़ी का कारखाना,

बीड़ी के प्रचार को एक माडल था ढूंढ़वाना.

उनके एक साथी ने दारासिंह को किया रेफर,

दारा का फोटू खिंचवा छपवाए बीड़ी के बैनर.

अगले दिन बीड़ी के बण्डल बाज़ार गए बिकने,

बीड़ी तो कोई न ख़रीदे पर सब लगे हंसने.

तभी दारा लाला के पास पहुंचा गुस्से से लाल,

पकड़ लाला का गट्टा बोला — तेरी ये मजाल.

लाला रह गया भौंचक्का उसे माजरा समझ न आया,

तब दारासिंह ने उसे बीड़ी का रैपर दिखलाया.

ऐसी प्रिंटिंग मिस्टेक थी कि लाला ने पकड़े कान,

“पहलवान छाप बीड़ी” कि जगह था “बीड़ी छाप पहलवान”.

 

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Published in: on नवम्बर 18, 2012 at 1:02 अपराह्न  Comments (1)  

राष्ट्र-गान: मेरे देश की धरती

मेरे देश की धरती,

नेताओं के बोझ तले कुचली तिल तिल मरती,

मेरे देश की धरती.

 

ये बना वृहद पाखाना इस में सबने हग के जाना,

सुवरों की मौज हुई और सभ्य जनता सड़ती.

मेरे देश की धरती.

 

एक भडुआ सरदार जो बना इसका जमादार,

मैडम के चरणों में उसने पगड़ी अपनी रख दी.

मेरे देश की धरती.

 

बने इस के रखवाले सारे कुत्ते खुजली वाले,

भौंक रहे संसद में देख के सारी दुनिया हंसती.

मेरे देश की धरती.

 

अब उसकी क्या पूंछे जिसकी आँख के ऊपर मूंछे,

कुटिल सिबल ने शिक्षा की मां-बहिन एक कर दी.

मेरे देश की धरती.

 

 एक कांग्रेस का कांडा जिसका फूट गया है भांडा,

हरयाणे में उसने सबकी धोती खोल के धर दी.

मेरे देश की धरती.

 

भारत की कायर जनता जिस से और तो कुछ न बनता,

जो अन्याय से लड़ता ये निंदा उसकी करती.

मेरे देश की धरती.

 

लौंडा मंद-बुद्धि और फेल जिसकी मां के हाथ नकेल,

कल भारत का पी.एम. होगा ये सोच के रूह सिहरती.

मेरे देश की धरती.

Published in: बिना श्रेणी on सितम्बर 8, 2012 at 3:13 अपराह्न  Comments (1)  

कवि सम्मलेन ले के बेलन …

कवि सम्मलेन ले के बेलन जा पहुंची एक नार,

भ्रकुटि उसकी भीम-गदा सी, जीभ तेज तलवार.

 

गरज के बोली कहाँ छुपा है निकम्मा मेरा दूल्हा,

जिसकी फूहड़ कविताओं से जलता मेरा चूल्हा.

 

कवि छुपा था मंच के नीचे अपनी आँखें मीचे,

आगे  श्रोता  जोर  लगाएं  पीछे  पत्नी  खींचे.

 

 हास्य रस का कवि भी देखो रोता अपने दुखड़े,

खींचतान  में  बेचारे  के  हो  गए  दो  टुकड़े.

 

एक टुकड़ा अब चूल्हा फूंके पत्नी-पाँव दबाये,

दूसरा  जूते  खाने  को कवि सम्मलेन जाये.

Published in: on सितम्बर 14, 2011 at 12:09 अपराह्न  Comments (1)  

वीर तुम बढ़े चलो

 वीर तुम बढ़े चलो,

धीर तुम बढ़े चलो,

सुधीर तुम बढ़े चलो,

समीर तुम बढ़े चलो,

बाकी सब पीछे रुको.

 

सामने पहाड़ हो,

सिंह की दहाड़ हो,

मुंह में दुखती दाढ़ हो,

या पेट-दर्द प्रगाढ़ हो,

तुम बिलकुल न झुको.

 

प्रात हो या रात हो,

संग हो न साथ हो,

समझ न आती बात हो,

खाने घूंसे-लात हो,

तो फिर जम कर ठुको.

 

हाथ में ध्वजा रहे,

चलने की सजा रहे,

जीने में न मजा रहे,

सदा बारह  बजा रहे,

तो फिर चल भी चुको.

Published in: on सितम्बर 8, 2011 at 6:31 अपराह्न  टिप्पणी करे  

काश ! मैं सियार होता

काश ! मैं सियार होता.

किसी भी रंग में रंगने को तैयार होता.

काश ! मैं सियार होता.

सामने से नहीं पीठ पर मेरा वार होता.

काश ! मैं सियार होता.

दुर्बल को सताता बली का ताबेदार होता.

काश ! मैं सियार होता.

गधे घोड़े हिरन सबका जीना दुश्वार होता.

काश ! मैं सियार होता.

मैं नोचता मुर्दा जो दूसरे का शिकार होता.

काश ! मैं सियार होता.

छोटी बड़ी हर सरकारी कुर्सी पर सवार होता.

काश ! मैं सियार होता.

बाप ठेकेदार तो बेटा थानेदार होता.

काश ! मैं सियार होता.

भारत भू की लूट का मैं भी हिस्सेदार होता.

काश ! मैं सियार होता.

 शेर की रियासत में सियासत का औज़ार होता.

काश ! मैं सियार होता.

भ्रष्टाचार के तेल में देश का अचार होता.

काश ! मैं सियार होता.

गुजर चुके कारवाँ का धूल भरा गुबार होता.

काश ! मैं सियार होता.

मेरी ख़बरों से भरा हर देसी अखबार होता.

काश ! मैं सियार होता.

आंतक के व्यापार में बयानों का हथियार होता.

काश ! मैं सियार होता.

मैं करता हुवां हुवां सोनिया का दरबार होता.

Published in: बिना श्रेणी on अगस्त 8, 2011 at 1:40 अपराह्न  टिप्पणी करे  

ये नेता कितने घिनौने है…

न पव्वा, न अद्धा, न पौने हैं,

ये नेता कितने घिनौने  है.

उस दिन किसी नेता से, मिला एक रंडी का दलाल,

उस दिन से मिट गया उसमे, उसके होने का मलाल.

उसने ये सच जाना, वो तो फिर भी गैरतमंद है,

नेता के धंधे में तो, कोठे से भी ज्यादा गंद है.

एक दिन शमशान में, खा रहा था मुर्दा नोच कर,

पूछा तो “मैं पिशाच हूँ”, बोला वो कुछ सोच कर.

वहीं एक ताज़ी लाश थी, उड़ता था कफ़न लहरा कर,

पूछा इसे कब खाओगे, तो बोला वो कुछ घबरा कर.

क्या तुम मदहोश हो, या कुछ ज्यादा पी ली है,

ये नेता की लाश है, मेरे लिए भी ज़हरीली है.

एक नेता एक वृद्ध को ले, पहुंचा कसाई के धाम था,

बोला ये मेरा बाप है, नहीं मेरे अब किसी काम का.

कहो क्या इसके दाम दोगे, फिर जिंदा रखो या मुर्दा,

बेच दो इसकी चाहे तुम, खाल, हड्डियां, लीवर, गुर्दा.

इनको चुन के भारतवासी पत्थर पे सर फोड़ेगा,

जो बाप को भी बेच आया, वो देश को क्या छोड़ेगा.

इनके आगे शैतान के, कारनामे कितने बौने हैं,

ये नेता कितने घिनौने  है.

Published in: on जुलाई 17, 2011 at 6:41 अपराह्न  टिप्पणी करे  

क्यों पायी आज़ादी …

सभी किस्म के भारतीय रिच हो या पुअर,

सब घिन्नाये देख दिग्विजय सिब्बल जैसे सूअर.

 

मंत्री संत्री या दिल्ली में जो घेरे बैठे सचिवालय,

औकात बस इतनी साफ़ करें मैडम का शौचालय.

 

क्रूरता इनकी बेलगाम, लालच इनका अनंत,

लीबिया सूडान के तानाशाह इनके सम्मुख संत.

 

पापी है या कुटिल, या मूर्ख हिंद की जनता,

ऐसे नरक के कीड़ों को, कोई अँधा भी न चुनता.

 

लानत है उस बेबस पर, जो मुखिया-ए-सरकार,

कहने को ‘सरदार’ पर बिलकुल नहीं ‘असरदार’.

 

शोषित, कुपोषित, शापित, चिरकुट ये सोचता अक्सर,

क्यों पायी आज़ादी इस से अंग्रेज ही थे बेहतर.

Published in: on जून 6, 2011 at 11:17 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

सम्राट की पहचान कर ले

(बच्चन जी की कविता “पूर्व चलने के बटोही…” से प्रेरित)

 

पूर्व सोने के निर्मोही, खाट की पहचान कर ले.

 खाट है निवाड़ की या लोहे का है पलंग,

चौड़ा है या एक करवट सोवे इतना तंग.

कंधे जितना ऊंचा है या चौकी जितना नीचा,

बिछी है उसपर चादर या की मखमल का गलीचा.

पूर्व सोने के …

 

दुबला पतला है या हट्टा कट्टा लम्बा चौड़ा,

अजनबी है या तुम्हारा दोस्त भी थोड़ा थोड़ा.

मोटा थुलथुल है या भाग के कर सकता है पीछा,

क्या सोच तूने मस्ती में उसका पायजामा खींचा?

पंगा लेने से पहले जाट की पहचान कर ले.

 

सिर्फ सस्ता माल है या मिलता है कुछ अच्छा भी,

ईमानदार है दुकानदार या नोच ले कच्छा भी.

रंगे हुए सब्जी-फल और लीद मिले मसाले,

घुन खाया गेहूं और कंकड़ वाली दालें.

सौदा लेने से पहले हाट की पहचान कर ले.

 

स्वार्थ  भांजने आये हो या आये कष्ट निवारण,

सच्ची श्रद्धा है मन में या भय है इसका कारण.

दो कौड़ी का बाबा है या नेता-सा अपराधी,

या बाहुबली के आगे तूने अपनी आन गवां दी.

शीश झुकाने से पूर्व, सम्राट की पहचान कर ले.

Published in: on जून 5, 2011 at 12:49 अपराह्न  टिप्पणी करे  

ये चीन बड़ा कमीन

ये चीन बड़ा कमीन, इसे मारो तमाचे तीन.

 

इसकी नीयत में है खोट, पीठ के पीछे मारे चोट,

काबू में इसके हैं देखो, १३० करोड़ रोबोट,

इसके लोभ के घेरे में, पडोसी देशों की जमीन.

 

इसे चलाते तानाशाह, जहरीली जिनकी निगाह,

इनके जुल्मों के नीचे, चीनी जनता रही कराह,

इनका बस चले तो लेले सबकी आज़ादी छीन.

 

बेचें सबको  सस्ता माल, गुणवत्ता में जो कंगाल,

घटिया दूध, खिलोने, गैजेट, बन गए जी का जंजाल,

इसको जनहित समझाना जैसे भैंस के आगे बीन.

 

चीन दुनिया का एक खतरा, समझो इसका हर पैंतरा,

क्रूरता इसका रोम रोम, धोखा  इसका कतरा कतरा,

भारत ने भी धोखा  खाया, जब इसका किया यकीन.

 

Published in: on दिसम्बर 17, 2010 at 8:27 अपराह्न  टिप्पणी करे  
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कुत्ता पाला, खुजली वाला

करुणानिधि ने कुत्ता पाला, खुजली वाला,

उसको दिल्ली ले के आये, मनमोहन लाला.

कुत्ते ने वो गंद मचाया, किया हर जगह गू,

पूरे भारत में फ़ैल गयी उसकी बदबू.

वहीं बैठा था एक स्वामी ध्यान लगाए,

इस बदबू ने उसके भी नथुने फढ़काए.

उसने मनमोहन को बोला इसे भगाओ,

इससे कहीं प्लेग न फैले देश बचाओ.

मनमोहन तो भैय्या कुर्सी के ऐसे पिस्सू ठहरे,

स्वामी के आगे बन गए जैसे गूंगे-बहरे.

स्वामी तब गुस्से में हो गए दुर्वासा,

मनमोहन की बत्ती गुल, फेंका ऐसा पांसा.

कलमाड़ी-राजा ने देश जैसा लूटा घनघोर,

हर्षद-तेलगी इनके आगे लगे चिंदी-चोर.

भारत चाहे कितनी भी कर ले तरक्की,

जब तक ये कीड़े जिन्दा, ज़लालत पक्की.