अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा,

कहीं ठिकाना नहीं मिले तो, आदर्श कोलोनी में घर ले, आजा.

 

चल पडा दब्बू सरदार, घोड़े पांच बंदूकें चार,

घुटनों  के बल मंत्री संत्री, मैडम का लगा दरबार.

 

नेता-अफसर खावें मोती, जनता एक रोटी को रोती,

करप्शन की कहाँ हद होती, कफ़न नोच के बांधे धोती.

 

शब्दहीन हो गया ये बन्दा, अर्थहीन हो गयी सब निंदा,

सारा देश है शर्मिंदा, सत्ता के सूवर क्यों जिन्दा.

 

मध्यवर्ग के भडुए जागो, ले के बोरिया बिस्तर भागो,

अमरीका में जा के दम लो, वहां से निज बौद्धिकता दागो.

 

हत्या, लूट, दगा, जालसाजी, सबको सबकी छूट,

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.

Advertisements

आदर्श कालोनी: आदर्श नगर

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

देश बेशक जाए पाताल में,

या फिर शत्रु के जाल में,

तीनो तीन से कदम ताल में,

भेडिये चले भेड़-खाल में,

नेता, अफसर, और कमांडर.

सीमा पर जो सिपाही सच्चे,

ठोकरें खाएं उनके बच्चे,

देश-हित में मरते मूरख,

विधवा उनकी झेले सौ दुःख,

आसरे को भटके दर-दर.

 सिपाही मरने जाए कारगिल,

कमांडर कब्जायें तीसवीं मंजिल,

जिनका चरित्र था इतना उज्जवल,

कितना गिर गए हैं ये जनरल,

 क्या होगा सेना पर असर.

चवन, छगन, देशमुख, शिंदे,

सारे इस नाली के गंदे,

लोभ में इतने हो गए अंधे,

बन गए शैतान के बन्दे,

निकृष्ट कर्म, आत्मा जर्जर.

अंधी लूट की बन्दर-बाँट,

फिर युवराज के तलुवे चाट,

फिर मैडम का गू खावें,

फुर्सत कहाँ जो राज चलावें,

बेबस जनता फोड़े अपना सर.

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

किताब री किताब

किताब री किताब, मुझको दे जवाब,

मेरी जिंदगी को किया क्यूँ खराब?

मैंने देखे पेड़, मैंने देखे खेत,

मैंने देखे दरिया, मैंने देखि रेत,

सब में प्रकृति की सुन्दरता बे-हिसाब,

किताब री …

मैंने देखा चंदा मैंने देखे तारे,

उड़ाई कभी पतंग, और कभी गुब्बारे,

इन के साथ मैं भी, उड़ता रहा जनाब,

किताब री …

मैंने देखी  धूप मैंने देखी छाँव,

सुनी कोयल की कूक, और कव्वे की कांव,

 जिन्न और परियों के देखे कई ख्वाब.

किताब री …

मैंने देखे दिन मैंने देखी  रात,

कबूतर की कातरता और बिल्ली की घात,

कभी डर के देखा कभी हो के बेताब.   

किताब री …

मैं हंसा खिल-खिल, मैं रोया जार जार,

कभी किनारे बैठा, कभी उतरा मझधार,

हर एहसास में था एक तजुर्बा नायाब.

किताब री …

इतने अनुभव जब जीवन में थे संभव,

क्यूँ सृष्टि में हुआ पुस्तक का उद्भव!

जब हाथ आई पुस्तक हुए बंद सभी द्वार,

बस खिड़की से जग के करने हैं दीदार,

खेलने पर प्रतिबन्ध, हुई सैर भी बंद,

गुम हुआ बच्चे के जीवन से आनंद.

कमर हुई टेढ़ी आँखों में लगा चश्मा,

अब बाँध न पाऊं अपने जूते का तस्मा,

मन में चिंता भारी कंधे पे बस्ता भारी,

जेल सी सकूल की ऊंची चारदीवारी,

किताब है जरूरी पर दवा के मानिंद,

 बरतें सिर्फ उतनी की जी उठे जिन्द.

जिंदगी की जंग में जो माँ-बाप हैं नाकाम,

बच्चे में निकाले अपने अधूरे अरमान,

क्यूँ मेरे बचपन पर मेरा हक नहीं,

मैंने ये समाज से माँगा है जवाब, किताब री …

Published in: on सितम्बर 12, 2010 at 2:37 अपराह्न  Comments (5)  
Tags: , ,

जनतंत्र में सबकी नीयत …

किसी नेता के खजाने से थैली निकली है,

देखो बाहर कहीं कोई रैली निकली है.

गुंडे, लुच्चे, बदमाश, निखट्टू होते हैं,

अब रैली में भाड़े के टट्टू होते हैं.

आना जाना खाना फ्री, सौ रुपैय्या रोज,

लड़ो, झगड़ो, चिल्लाओ, जितनी करो मौज.

रास्ता रोको बसें जलाओ, और दुकानें फूंको,

करो लूट-खसोट, लुच्चई का कोई न मौका चूको.

खुल जायेगी किस्मत जो पुलीस ने लाठी मारी,

निकम्मी सरकार से मिलेगा कम्पेंसशन भारी.

जनतंत्र में सबकी नीयत मैली निकली है.

देखो बाहर कहीं कोई रैली निकली है.

Published in: on जुलाई 19, 2010 at 8:20 अपराह्न  Comments (2)  

ये भारत है, चुप रह हलकट!

ये गर्मी और बिजली का संकट,

ये भारत है, चुप रह हलकट!

जितनी बिजली होती पैदा,

उस से होता सबको फैदा.

आधी बिजली चोर को जाती,

चौथाई घूसखोर को जाती.

छठवां हिस्सा नेता खाते,

बाकी बची तो हम सब पाते.

जो नियम से भरते बिल,

वो नहीं बिजली के काबिल.

उसने ही बिजली का सुख पाया,

जिस पर कई करोड़ बकाया.

या चोरी की आदत डालो,

लाइन मैन को टुकड़ा डालो.

सीधा बंद धूप में जलता,

चोर के घर में ए. सी. चलता.

तू बैठ किनारे पोंछ पसीना,

सीख ले बिन बिजली जीना.

थानेदार बन बैठा गिरहकट,

ये भारत है, चुप रह हलकट!

Published in: on जुलाई 11, 2010 at 11:35 पूर्वाह्न  Comments (4)  

ये किसने फैलाया तेल

मची है देखो रेलमपेल, ये किसने फैलाया तेल?

सागर में भी तेल बरसे, अमरीका में निकले जिधर से,

कुछ लीटर भारत भिजवा दो, यहाँ हम बूँद बूँद को तरसें.

बस ईंधन का तेल नहीं, बाकी हर वसले का तेल,

माओवादी असले का तेल, भोपाल मसले का तेल.

रेडियो एक्टिव कबाड़ का तेल, अर्थ व्यवस्था उजाड़ का तेल,

एक दोगले वकील का देखो, शिक्षा से खिलवाड़ का तेल.

महंगाई की मार का तेल, विकट भ्रष्टाचार का तेल,

भुखमरी, गरीबी, लाचारी, मिलेगा हर प्रकार का तेल.

आज़ादी के बाद से खेलें, ये कोल्हू का खेल निराला,

साठ साल से नेताओं ने जनता का ही तेल निकाला.

जब कोल्हू में निर्धन पिसता है, खून नहीं आंसू रिसता है,

सत्ता है वो सान जिस पर, नेता निज चाक़ू घिसता है.

कचूमर निकल चुका जनता का, अब तो बंद करो ये खेल,

मची है देखो रेलमपेल, ये किसने फैलाया तेल!

Published in: on जून 20, 2010 at 10:30 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

भोपाल पर श्रगाल रूदन

मीडिया के कुत्ते भौंक रहें हैं,

नेता और समाज सेवी ताल ठोंक रहे हैं.

माध्यम वर्ग के दोगले बुद्धिजीवी —

जो सोये पड़े थे, जागे और चौंक रहे हैं.

करोड़ों का अखबारी कागज़ होगा बर्बाद,

दफ्तरों में बाबू करेंगे, काम छोड़ बकवाद,

फिर बैठेगी जांच और फिर होगी फ़रियाद,

सरकारी सुवरों और दलालों में बंटेगा प्रसाद.

फिर २५ साल बाद आएगा एक और verdict,

क्या उसका मजमून होगा हम कर सकतें है predict,

और तब तक मर चुके होंगे सारे convict,

हम भी हो चुके हैं इस व्यवस्था के addict.

अब इस तमाशे पर लगाओ लगाम,

बंद करो ढकोसला, लगो अपने काम,

मरने वाले मर गए उनको रोना छोडो,

है भारत के हर हादसे का यही अंजाम.

Published in: on जून 15, 2010 at 12:00 अपराह्न  टिप्पणी करे  

भोपाल भोपाल जय गोपाल

भोपाल भोपाल जय गोपाल.

२५ साल पहले यहाँ बरसा था काल,

जीते जागते लोग बन गए कंकाल,

 भोपाल भोपाल जय गोपाल.

कुछ घंटों में था भारत के बाहर,

इतनी तेज हो गयी एंडरसन की चाल.

कोई क़ानून न पहुँच पाया उस तक,

सत्ता  के कुत्ते बन गए उसकी ढाल.

ले के खड़े कंपनसेशन का कटोरा,

अमरीका से बोले प्रभु टुकड़ा तो डाल.

जुट गयी सब तरफ दलालों की भीड़,

सब साले नोचें भूखे-नंगो की खाल.

यूनियन  कार्बाइड तो डूब गयी बिक गयी,

कितने बिचोलिये हो गए मालामाल.

अपंगों की एक पीढ़ी गुजर गयी,

इतनी सुस्त पड़ गयी न्याय की चाल.

भोपाल ही नहीं हुआ था सिखों का नर-संहार,

बड़ा ही भयानक था सन ८४ का साल.

मौज कर रहे उन दंगो के मुजरिम,

दयनीय है दंगों की जांच का भी हाल.

हम बेशर्म भारतीय कभी न जागना चाहें,

समस्या हो चाहे कितनी विकराल.

वो हाथ अपना पिछवाडा खुजलायें,

जिन हाथों में होनी चाहिए थी मशाल.

बुझी बीड़ी जैसी अपनी युवा पीढी,

सामाजिक सरोकार को समझें जी का जंजाल.

चलो पूरा हो गया बौद्धिक विलाप का कोटा,

गर्म हो गयी दारु, थोड़ी बरफ तो डाल.

Published in: on जून 10, 2010 at 10:26 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

हिन्दू की परिभाषा

ब्रह्मपुत्र से सिन्धु, भटक गए सब हिन्दू.

हर नुक्कड़ पर बाबा, हर गली में आश्रम,

लगी हैं दुकाने, सब बेचें अपना धर्म.

सब और कोलाहल, लगा है एक तमाशा,

सबको विस्मृत क्या है, हिन्दू की परिभाषा.

सबका अपना स्वार्थ, लगी हुई है मंडी,

बैठा हर मठ के अन्दर एक पाखंडी.

“मैं ज्ञानी, मैं ध्यानी, मैं संत, मैं योगी”,

वानरों सा चीखें, भांति भांति के ढोंगी.

इस धर्म में मर्म है, कैसे हो विश्वास,

दुनिया भर में होता, हिन्दू का उपहास.

क्यों हम कमियां दूसरों की निकालें,

गिरने लगी दीवारें, अब अपना घर संभालें.

फिर नापेंगे धरा, और जीतेंगे अम्बर,

पहले दूर करें, धर्म से आडम्बर.

बिखरे पड़े देश में, काशी से कोलाबा,

कौन सा ज्ञान देंगे, ये अधकचरे बाबा.

निज बुद्धि से सोचो, अपने कर्म सुधारो,

ये बाबा निकृष्ट, इनको लात मारो.

छल, कपट, झूठ, घृणा और प्रतिशोध,

उत्थान के मार्ग के, ये पांच अवरोध.

हिंदुत्व नहीं है पूजा, न आरती की थाली,

न रिश्वत-सी मन्नत, जिसने मानी — पा ली.

ज्ञान, तर्क, श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया,

जिसने इनको माना, वो हिन्दू हो गया. 

मार्ग दर्शन को काफी, है गीता का ज्ञान,

ये सृष्टि उसी की, है कण कण में भगवान्.

कहाँ राह भूले थे, आज विचारें ये बिंदु.

ब्रह्मपुत्र से सिन्धु, राह आयें सब हिन्दू.

Published in: बिना श्रेणी on जून 2, 2010 at 4:52 अपराह्न  टिप्पणी करे  

काम करो, नाम करो …

काम करो,

नाम करो,

उसके बाद

आराम करो.

लो मकान

या दूकान

या कोई

और सामान 

सफ़ेद पैसे  से

दाम भरो.

उसके बाद …

खरीदो कार

या सरकार,

सैकेंड हैंड

या बेकार,

बदलने से

न डरो.

उसके बाद …

टी वी झेलो

बीवी झेलो,

या चाहे

बच्चों से खेलो,

दफ्तर में न

शाम करो.

उसके बाद …

खाओ खाना

न मनमाना,

सेहत देगी

फिर हर्जाना,

संयम को

सलाम करो.

उसके बाद …

दो हाथों से

बजती ताली,

न दो गाली

न लो गाली,

न सुख चैन

हराम करो.

उसके बाद …

न तू दाता

न विधाता,

तेरे बाप का

फिर क्या जाता?

अपनी मंशा

आम करो.

उसके बाद …

लाखों दुःख

मन को घेरे,

पर उपदेश

कुशल बहुतेरे,

चीयर्स बोल के

जाम भरो,

उसके बाद

आराम करो.

Published in: on मई 30, 2010 at 1:18 अपराह्न  Comments (2)