ये चीन बड़ा कमीन

ये चीन बड़ा कमीन, इसे मारो तमाचे तीन.

 

इसकी नीयत में है खोट, पीठ के पीछे मारे चोट,

काबू में इसके हैं देखो, १३० करोड़ रोबोट,

इसके लोभ के घेरे में, पडोसी देशों की जमीन.

 

इसे चलाते तानाशाह, जहरीली जिनकी निगाह,

इनके जुल्मों के नीचे, चीनी जनता रही कराह,

इनका बस चले तो लेले सबकी आज़ादी छीन.

 

बेचें सबको  सस्ता माल, गुणवत्ता में जो कंगाल,

घटिया दूध, खिलोने, गैजेट, बन गए जी का जंजाल,

इसको जनहित समझाना जैसे भैंस के आगे बीन.

 

चीन दुनिया का एक खतरा, समझो इसका हर पैंतरा,

क्रूरता इसका रोम रोम, धोखा  इसका कतरा कतरा,

भारत ने भी धोखा  खाया, जब इसका किया यकीन.

 

Published in: on दिसम्बर 17, 2010 at 8:27 अपराह्न  टिप्पणी करे  
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किताब री किताब

किताब री किताब, मुझको दे जवाब,

मेरी जिंदगी को किया क्यूँ खराब?

मैंने देखे पेड़, मैंने देखे खेत,

मैंने देखे दरिया, मैंने देखि रेत,

सब में प्रकृति की सुन्दरता बे-हिसाब,

किताब री …

मैंने देखा चंदा मैंने देखे तारे,

उड़ाई कभी पतंग, और कभी गुब्बारे,

इन के साथ मैं भी, उड़ता रहा जनाब,

किताब री …

मैंने देखी  धूप मैंने देखी छाँव,

सुनी कोयल की कूक, और कव्वे की कांव,

 जिन्न और परियों के देखे कई ख्वाब.

किताब री …

मैंने देखे दिन मैंने देखी  रात,

कबूतर की कातरता और बिल्ली की घात,

कभी डर के देखा कभी हो के बेताब.   

किताब री …

मैं हंसा खिल-खिल, मैं रोया जार जार,

कभी किनारे बैठा, कभी उतरा मझधार,

हर एहसास में था एक तजुर्बा नायाब.

किताब री …

इतने अनुभव जब जीवन में थे संभव,

क्यूँ सृष्टि में हुआ पुस्तक का उद्भव!

जब हाथ आई पुस्तक हुए बंद सभी द्वार,

बस खिड़की से जग के करने हैं दीदार,

खेलने पर प्रतिबन्ध, हुई सैर भी बंद,

गुम हुआ बच्चे के जीवन से आनंद.

कमर हुई टेढ़ी आँखों में लगा चश्मा,

अब बाँध न पाऊं अपने जूते का तस्मा,

मन में चिंता भारी कंधे पे बस्ता भारी,

जेल सी सकूल की ऊंची चारदीवारी,

किताब है जरूरी पर दवा के मानिंद,

 बरतें सिर्फ उतनी की जी उठे जिन्द.

जिंदगी की जंग में जो माँ-बाप हैं नाकाम,

बच्चे में निकाले अपने अधूरे अरमान,

क्यूँ मेरे बचपन पर मेरा हक नहीं,

मैंने ये समाज से माँगा है जवाब, किताब री …

Published in: on सितम्बर 12, 2010 at 2:37 अपराह्न  Comments (5)  
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पव्वा पिला …

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो जादू, मैं दुनिया हिला दूं,

रात का सिकंदर, सुबह नाली में मिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो दम, मिटे सारे रंजो-गम,

बच्चों के भूखे पेट, मेरे पीने का सिला.

पव्वा पिला …

फटे चीथड़े पहन, रखी कोठरी भी रहन,

नशे में तो मैं जीत लाया था किला.

पव्वा पिला …

पी पी के शराब, किये गुर्दे भी खराब,

न पीता तो खुद ही दबा देता अपना गला.

पव्वा पिला …

 है आठों पहर, ये जिंदगी जहर,

इस पीड़ा से तू मुझे मुक्ति दिला.

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

Published in: on अप्रैल 29, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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मेरे सर के बाल झड़ते

जैसे पतझड़ में उपवन के, फूल पीले लाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे आंधी तूफानों में, पात पेड़ के डाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे जिज्ञासु के श्रीमुख से, अधकचरे सवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे बेमानी मुद्दों पे, शहर शहर बवाल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे उम्र की झाडी से, नाकामी के साल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

जैसे फर्जी तेल बेच के, वैद्य गंजों का माल झड़ते,

मेरे सर के बाल झड़ते.

Published in: on फ़रवरी 7, 2010 at 9:50 पूर्वाह्न  Comments (1)  
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सर्दी आयी

सर्दी आयी सर्दी आयी

नहाने की हुई छुट्टी भाई, सर्दी आयी …

पड़ोस में जो रहते हैं,

वो मास्टर जी कहते हैं,

पानी बहुत कीमती है,

मैंने बूँद बूँद बचाई, सर्दी आयी …

किसी को भी नहीं इल्म है,

नहाना कितना बड़ा जुल्म है,

इस से कितनी हानि होती,

जिसकी नहीं कोई भरपाई, सर्दी आयी …

मैं तो पहले से  ही पतला,

नहा  के हो गया और भी दुबला,

  धुल जाती खाल पे मैंने

मेल की जो परत चढ़ाई, सर्दी आयी …

काश अगर कुछ ऐसा होता,

जग में ये पानी न होता,

न हर महीने दोस्त ये कहते,

अब तो नहा ले भाई, सर्दी आयी …

Published in: on दिसम्बर 26, 2009 at 12:17 अपराह्न  टिप्पणी करे  
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