कवि सम्मलेन ले के बेलन …

कवि सम्मलेन ले के बेलन जा पहुंची एक नार,

भ्रकुटि उसकी भीम-गदा सी, जीभ तेज तलवार.

 

गरज के बोली कहाँ छुपा है निकम्मा मेरा दूल्हा,

जिसकी फूहड़ कविताओं से जलता मेरा चूल्हा.

 

कवि छुपा था मंच के नीचे अपनी आँखें मीचे,

आगे  श्रोता  जोर  लगाएं  पीछे  पत्नी  खींचे.

 

 हास्य रस का कवि भी देखो रोता अपने दुखड़े,

खींचतान  में  बेचारे  के  हो  गए  दो  टुकड़े.

 

एक टुकड़ा अब चूल्हा फूंके पत्नी-पाँव दबाये,

दूसरा  जूते  खाने  को कवि सम्मलेन जाये.

Published in: on सितम्बर 14, 2011 at 12:09 अपराह्न  Comments (1)  

अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा,

कहीं ठिकाना नहीं मिले तो, आदर्श कोलोनी में घर ले, आजा.

 

चल पडा दब्बू सरदार, घोड़े पांच बंदूकें चार,

घुटनों  के बल मंत्री संत्री, मैडम का लगा दरबार.

 

नेता-अफसर खावें मोती, जनता एक रोटी को रोती,

करप्शन की कहाँ हद होती, कफ़न नोच के बांधे धोती.

 

शब्दहीन हो गया ये बन्दा, अर्थहीन हो गयी सब निंदा,

सारा देश है शर्मिंदा, सत्ता के सूवर क्यों जिन्दा.

 

मध्यवर्ग के भडुए जागो, ले के बोरिया बिस्तर भागो,

अमरीका में जा के दम लो, वहां से निज बौद्धिकता दागो.

 

हत्या, लूट, दगा, जालसाजी, सबको सबकी छूट,

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.

आदर्श कालोनी: आदर्श नगर

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

देश बेशक जाए पाताल में,

या फिर शत्रु के जाल में,

तीनो तीन से कदम ताल में,

भेडिये चले भेड़-खाल में,

नेता, अफसर, और कमांडर.

सीमा पर जो सिपाही सच्चे,

ठोकरें खाएं उनके बच्चे,

देश-हित में मरते मूरख,

विधवा उनकी झेले सौ दुःख,

आसरे को भटके दर-दर.

 सिपाही मरने जाए कारगिल,

कमांडर कब्जायें तीसवीं मंजिल,

जिनका चरित्र था इतना उज्जवल,

कितना गिर गए हैं ये जनरल,

 क्या होगा सेना पर असर.

चवन, छगन, देशमुख, शिंदे,

सारे इस नाली के गंदे,

लोभ में इतने हो गए अंधे,

बन गए शैतान के बन्दे,

निकृष्ट कर्म, आत्मा जर्जर.

अंधी लूट की बन्दर-बाँट,

फिर युवराज के तलुवे चाट,

फिर मैडम का गू खावें,

फुर्सत कहाँ जो राज चलावें,

बेबस जनता फोड़े अपना सर.

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

किताब री किताब

किताब री किताब, मुझको दे जवाब,

मेरी जिंदगी को किया क्यूँ खराब?

मैंने देखे पेड़, मैंने देखे खेत,

मैंने देखे दरिया, मैंने देखि रेत,

सब में प्रकृति की सुन्दरता बे-हिसाब,

किताब री …

मैंने देखा चंदा मैंने देखे तारे,

उड़ाई कभी पतंग, और कभी गुब्बारे,

इन के साथ मैं भी, उड़ता रहा जनाब,

किताब री …

मैंने देखी  धूप मैंने देखी छाँव,

सुनी कोयल की कूक, और कव्वे की कांव,

 जिन्न और परियों के देखे कई ख्वाब.

किताब री …

मैंने देखे दिन मैंने देखी  रात,

कबूतर की कातरता और बिल्ली की घात,

कभी डर के देखा कभी हो के बेताब.   

किताब री …

मैं हंसा खिल-खिल, मैं रोया जार जार,

कभी किनारे बैठा, कभी उतरा मझधार,

हर एहसास में था एक तजुर्बा नायाब.

किताब री …

इतने अनुभव जब जीवन में थे संभव,

क्यूँ सृष्टि में हुआ पुस्तक का उद्भव!

जब हाथ आई पुस्तक हुए बंद सभी द्वार,

बस खिड़की से जग के करने हैं दीदार,

खेलने पर प्रतिबन्ध, हुई सैर भी बंद,

गुम हुआ बच्चे के जीवन से आनंद.

कमर हुई टेढ़ी आँखों में लगा चश्मा,

अब बाँध न पाऊं अपने जूते का तस्मा,

मन में चिंता भारी कंधे पे बस्ता भारी,

जेल सी सकूल की ऊंची चारदीवारी,

किताब है जरूरी पर दवा के मानिंद,

 बरतें सिर्फ उतनी की जी उठे जिन्द.

जिंदगी की जंग में जो माँ-बाप हैं नाकाम,

बच्चे में निकाले अपने अधूरे अरमान,

क्यूँ मेरे बचपन पर मेरा हक नहीं,

मैंने ये समाज से माँगा है जवाब, किताब री …

Published in: on सितम्बर 12, 2010 at 2:37 अपराह्न  Comments (5)  
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पव्वा पिला …

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो जादू, मैं दुनिया हिला दूं,

रात का सिकंदर, सुबह नाली में मिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो दम, मिटे सारे रंजो-गम,

बच्चों के भूखे पेट, मेरे पीने का सिला.

पव्वा पिला …

फटे चीथड़े पहन, रखी कोठरी भी रहन,

नशे में तो मैं जीत लाया था किला.

पव्वा पिला …

पी पी के शराब, किये गुर्दे भी खराब,

न पीता तो खुद ही दबा देता अपना गला.

पव्वा पिला …

 है आठों पहर, ये जिंदगी जहर,

इस पीड़ा से तू मुझे मुक्ति दिला.

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

Published in: on अप्रैल 29, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
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