ये नेता कितने घिनौने है…

न पव्वा, न अद्धा, न पौने हैं,

ये नेता कितने घिनौने  है.

उस दिन किसी नेता से, मिला एक रंडी का दलाल,

उस दिन से मिट गया उसमे, उसके होने का मलाल.

उसने ये सच जाना, वो तो फिर भी गैरतमंद है,

नेता के धंधे में तो, कोठे से भी ज्यादा गंद है.

एक दिन शमशान में, खा रहा था मुर्दा नोच कर,

पूछा तो “मैं पिशाच हूँ”, बोला वो कुछ सोच कर.

वहीं एक ताज़ी लाश थी, उड़ता था कफ़न लहरा कर,

पूछा इसे कब खाओगे, तो बोला वो कुछ घबरा कर.

क्या तुम मदहोश हो, या कुछ ज्यादा पी ली है,

ये नेता की लाश है, मेरे लिए भी ज़हरीली है.

एक नेता एक वृद्ध को ले, पहुंचा कसाई के धाम था,

बोला ये मेरा बाप है, नहीं मेरे अब किसी काम का.

कहो क्या इसके दाम दोगे, फिर जिंदा रखो या मुर्दा,

बेच दो इसकी चाहे तुम, खाल, हड्डियां, लीवर, गुर्दा.

इनको चुन के भारतवासी पत्थर पे सर फोड़ेगा,

जो बाप को भी बेच आया, वो देश को क्या छोड़ेगा.

इनके आगे शैतान के, कारनामे कितने बौने हैं,

ये नेता कितने घिनौने  है.

Advertisements
Published in: on जुलाई 17, 2011 at 6:41 अपराह्न  टिप्पणी करे  

क्यों पायी आज़ादी …

सभी किस्म के भारतीय रिच हो या पुअर,

सब घिन्नाये देख दिग्विजय सिब्बल जैसे सूअर.

 

मंत्री संत्री या दिल्ली में जो घेरे बैठे सचिवालय,

औकात बस इतनी साफ़ करें मैडम का शौचालय.

 

क्रूरता इनकी बेलगाम, लालच इनका अनंत,

लीबिया सूडान के तानाशाह इनके सम्मुख संत.

 

पापी है या कुटिल, या मूर्ख हिंद की जनता,

ऐसे नरक के कीड़ों को, कोई अँधा भी न चुनता.

 

लानत है उस बेबस पर, जो मुखिया-ए-सरकार,

कहने को ‘सरदार’ पर बिलकुल नहीं ‘असरदार’.

 

शोषित, कुपोषित, शापित, चिरकुट ये सोचता अक्सर,

क्यों पायी आज़ादी इस से अंग्रेज ही थे बेहतर.

Published in: on जून 6, 2011 at 11:17 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  

कुत्ता पाला, खुजली वाला

करुणानिधि ने कुत्ता पाला, खुजली वाला,

उसको दिल्ली ले के आये, मनमोहन लाला.

कुत्ते ने वो गंद मचाया, किया हर जगह गू,

पूरे भारत में फ़ैल गयी उसकी बदबू.

वहीं बैठा था एक स्वामी ध्यान लगाए,

इस बदबू ने उसके भी नथुने फढ़काए.

उसने मनमोहन को बोला इसे भगाओ,

इससे कहीं प्लेग न फैले देश बचाओ.

मनमोहन तो भैय्या कुर्सी के ऐसे पिस्सू ठहरे,

स्वामी के आगे बन गए जैसे गूंगे-बहरे.

स्वामी तब गुस्से में हो गए दुर्वासा,

मनमोहन की बत्ती गुल, फेंका ऐसा पांसा.

कलमाड़ी-राजा ने देश जैसा लूटा घनघोर,

हर्षद-तेलगी इनके आगे लगे चिंदी-चोर.

भारत चाहे कितनी भी कर ले तरक्की,

जब तक ये कीड़े जिन्दा, ज़लालत पक्की.

अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा, टेक सेर भाजी टेक सेर खाजा,

कहीं ठिकाना नहीं मिले तो, आदर्श कोलोनी में घर ले, आजा.

 

चल पडा दब्बू सरदार, घोड़े पांच बंदूकें चार,

घुटनों  के बल मंत्री संत्री, मैडम का लगा दरबार.

 

नेता-अफसर खावें मोती, जनता एक रोटी को रोती,

करप्शन की कहाँ हद होती, कफ़न नोच के बांधे धोती.

 

शब्दहीन हो गया ये बन्दा, अर्थहीन हो गयी सब निंदा,

सारा देश है शर्मिंदा, सत्ता के सूवर क्यों जिन्दा.

 

मध्यवर्ग के भडुए जागो, ले के बोरिया बिस्तर भागो,

अमरीका में जा के दम लो, वहां से निज बौद्धिकता दागो.

 

हत्या, लूट, दगा, जालसाजी, सबको सबकी छूट,

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट.

आदर्श कालोनी: आदर्श नगर

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

देश बेशक जाए पाताल में,

या फिर शत्रु के जाल में,

तीनो तीन से कदम ताल में,

भेडिये चले भेड़-खाल में,

नेता, अफसर, और कमांडर.

सीमा पर जो सिपाही सच्चे,

ठोकरें खाएं उनके बच्चे,

देश-हित में मरते मूरख,

विधवा उनकी झेले सौ दुःख,

आसरे को भटके दर-दर.

 सिपाही मरने जाए कारगिल,

कमांडर कब्जायें तीसवीं मंजिल,

जिनका चरित्र था इतना उज्जवल,

कितना गिर गए हैं ये जनरल,

 क्या होगा सेना पर असर.

चवन, छगन, देशमुख, शिंदे,

सारे इस नाली के गंदे,

लोभ में इतने हो गए अंधे,

बन गए शैतान के बन्दे,

निकृष्ट कर्म, आत्मा जर्जर.

अंधी लूट की बन्दर-बाँट,

फिर युवराज के तलुवे चाट,

फिर मैडम का गू खावें,

फुर्सत कहाँ जो राज चलावें,

बेबस जनता फोड़े अपना सर.

आदर्श नगर की भ्रष्ट डगर,

मुंबई का एक और गटर.

पव्वा पिला …

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो जादू, मैं दुनिया हिला दूं,

रात का सिकंदर, सुबह नाली में मिला.

पव्वा पिला …

पव्वे में वो दम, मिटे सारे रंजो-गम,

बच्चों के भूखे पेट, मेरे पीने का सिला.

पव्वा पिला …

फटे चीथड़े पहन, रखी कोठरी भी रहन,

नशे में तो मैं जीत लाया था किला.

पव्वा पिला …

पी पी के शराब, किये गुर्दे भी खराब,

न पीता तो खुद ही दबा देता अपना गला.

पव्वा पिला …

 है आठों पहर, ये जिंदगी जहर,

इस पीड़ा से तू मुझे मुक्ति दिला.

पव्वा पिला यार पव्वा पिला,

औरों से शिकवा, खुद से गिला.

Published in: on अप्रैल 29, 2010 at 11:37 पूर्वाह्न  टिप्पणी करे  
Tags: ,